गुरुवार, 1 जून 2023

कैसे मान लूं... आप नहीं रहे तुषार भाई....

तस्वीर धुंधली है, लेकिन यादें चमकदार और एकदम स्पष्ट। तीन दिन बीत गए... हफ्ते और महीने बीत जाएंगे... साल भी बीत जाएंगे... लेकिन, यह यकीन करना कठिन होगा कि मेरा यार मुझसे बहुत दूर चला गया। मैं ही नहीं, मेरे जैसे सैकड़ों लोगों इस मनहूस खबर को शायद दिल से कभी स्वीकार नहीं कर पाएं, लेकिन संवेदनाओं और भावनाओं से अप्रभावी व तटस्थ मस्तिष्क निरंतर यही समझाने का प्रयास कर रहा है कि अग्निज्वाला में भस्म बन जाने के बाद सिर्फ आत्मा बचती है,जो अमर है...अविनाशी है। 

तुषार भाई से हमारी मुलाकात तब हुई, जब मैं खुर्जा से स्थानांतरण के बाद बुलंदशहर पहुंचा था। वर्ष शायद 2003 रहा होगा। तब तुषार तिवारी दैनिक जागरण के छाया पत्रकार थे। आदरणीय कमलेश शुक्ल जी ब्यूरो प्रभारी थे। मैं उनके सहायक के रूप में वहां पहुंचा था। तुषार भाई शुक्ल सर की सरलता और ईमानदारी से प्रभावित थे। तुषार भाई के व्यक्तित्व का अक्खड़पन सहज था। मैं पत्रकारिता में नवप्रवेशु था, इसलिए चुप रहकर हालात और चीजों को समझने का प्रयास कर रहा था। तुषार भाई को भी। मैं पत्नी व बच्चे का साथ बुलंदशहर पहुंचा था और तुषार भाई अकेले रहते थे।  

चंद दिनों बाद क्राइम बीट की जिम्मेदारी मिली। यहां से हम और तुषार भाई विक्रम-बेताल बन गए। कभी वे मेरी बाइक पर, तो कभी मैं उनकी। यमुना खादर में यूपी और हरियाणा के किसानों के संघर्ष की कवरेज हो अथवा बुलंदशहर जिले के पुनर्गठन के बाद ग्रेटर नोएडा के बुलंदशहर में आने के बाद की प्रतिक्रियाओं की कवरेज का मामला... एक दिन में 200-200 किलोमीटर तक बाइक चलाई। तुषार भाई जितने अक्खड़ थे, उससे कहीं ज्यादा दयालु व परोपकारी। अपने हिस्से का खाना दान करना उनके लिए कहावत भर नहीं थी... वे अक्सर ऐसा कर दिया करते थे। 

तुषार भाई के पास सिल्वर रंग की बाइक थी, हीरो हॉन्डा स्पलेंडर। नंबर था- 'यूपी...1234'। 2006 रहा होगा। नुमाइश में हम पत्रकार चकल्लस काट रहे थे। कुछ लोग रवींद्र नाट्यशाला में कार्यक्रम देख रहे थे, तो कुछ परिवार को नुमाइश घुमा रहे थे। अचनाक तुषार भाई का फोन आया। वह हंस रहे थे। मैंने भी मजाक में पूछा- क्या देख लिया। उन्होंने कहा, कुछ देखा नहीं कुणाल जी... बाइक 123 हो गई। मुझे यह समझने में थोड़ा वक्त लग गया कि तुषार भाई अपनी बाइक चोरी होने की सूचना दे रहे हैं।  

एक दिन अचनाक बताया कि वह दैनिक जागरण छोड़ रहे हैं। फिर बताया कि नेटवर्क-18 के लिए काम करेंगे मेरठ में। कुछ दिनों तक मेरठ में रहे, लेकिन उनका मन नहीं माना। बुलंदशहर लौट आए। किस्मत देखिए कि वे बुलंदशहर लौट आए और मेरा स्थानांतरण 2007 में मेरठ हो गया। जब भी बुलंदशहर जाता, मुलाकात जरूर होती। एक लंबे अंतराल के बाद पता चला कि भाई की शादी हो गई है। मैं शिकायत करता, इससे पहले भाई ने कहा जो कुछ हुआ भूल जाइए... हम भी भूल गए हैं।

आखिरी मुलाकात जहांगीराबाद में तीन वर्ष पहले हुई थी। पत्रकार हेमंत कौशिक भाई की भतीजी की शादी में। लंबे अरसे बाद... गले मिले तो काफी देर तक वैसे ही चिपके रहे। न मुझे छोड़ने का मन कर रहा था और न उन्हें... बहुत सारी बातें करनी थीं, लेकिन उचित मौका नहीं था। हालांकि, हमने एक दूसरे की आंखों में बनते-बिगड़ते हालात को महसूस कर लिया था, पढ़ लिया था। बीच में कुछ-एक बार फोन पर बातचीत हुई। फोन से याद आया... उनका मोबाइल नंबर xxxxxxx999 हासिल करने का किस्सा। न जानें कितनी यादें... कुछ बेहद निजी। सांसों के साथ दफ्न हो जाने वाली।

आपको अलविदा नहीं कहेंगे तुषार भाई... हम आपको अपनी यादों में ओस की उन बूंदों की तरह संजो कर रखेंगे, जो अरुणिमा के साथ स्वर्णिम आभा से युक्त मन को शांति और संबल प्रदान करती हैं... ऊं शांति... ऊं शांति... ऊं शांति...

शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

श्री महाकाल से एकाकार....

पांच दिसंबर, 2022 को श्री ओंकारेश्वर व श्री ममकेश्वर के दर्शन के बाद मां क्षिप्रा की आरती में हम लोग शामिल हुए। वापसी में आदिशक्ति हरसिद्धि माता की आरती में भी शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जीवन में बहुत कम ही मौके आते हैं, जब सुबह, दिन व शाम शानदार हो। यह वही मौका था, लेकिन छह दिसंबर का ब्रह्म मुहूर्त तो अनंत कालराशि के लिए अविस्मरणीय होने वाला था। माताजी, देवांश, श्रीमतीजी व मैं महाकाल की आरती के लिए अंतःकरण से रोमांचित थे। जल्दी सोने का उपक्रम शुरू तो हुआ, लेकिन किसी को नींद नहीं आई। झपकी जरूर आई होगी। रात दो बजे से पहले ही हम सभी उठ गए और नहाकर तैयार हो गए। तीन बजे से पहले हम गेट नंबर तीन पर पहुंच गए, लेकिन वहां पता चला कि हमें गेट नंबर दो से प्रवेश करना है।

गेट नंबर दो बड़ा गणेश मंदिर के पास है, जबकि गेट नंबर तीन भारत माता मंदिर के पास। भगवान भोलेनाथ की कृपा से हम सभी गेट नंबर तीन के पास पहुंच गए। माताजी आस्टोपोरोसिस की मरीज हैं, चलने फिरने में थोड़ी दिक्कत होती है, लेकिन श्री महाकाल ने उन्हें अलौकिक ऊर्जा प्रदान कर दी। प्रातः तीन बजे से करीब साढ़े चार बजे तक इंतजार के बाद श्री महाकाल दरबार में प्रवेश का सौभाग्य मिला। लाइन में जो लोग हमसे पीछे थे वे आगे निकल गए और पहली या दूसरी पंक्ति में बैठ गए। हमें पिछली पंक्ति में जगह मिली। श्री महाकाल स्नान, शृंगार व आरती का सजीव प्रसारण सामने लगी स्क्रीन पर भी हो रहा था। कभी हम सीधे महाकाल को देखने का प्रयास करते, तो कभी स्क्रीन पर देखते।

भस्म आरती के लिए आए सभी भक्तों में अद्भुत श्रद्धा व ऊर्जा थी। भगवान का स्नान हुआ। दूध से, जल से, घृत से.... स्नान की विधियां पूरी हुईं तो शृंगार का कार्यक्रम शुरू हुआ। पुजारियों का दल शृंगार में परांगत था। श्री महाकाल स्तुति के बीच शृंगार का कार्यक्रम करीब आधे घंटे या उससे कुछ ज्यादा समय तक चला और जब पूरा हुआ तो श्री महाकाल का मुस्कुराता हुआ मुख मन-मस्तिष्क में इतनी ऊर्जा और अलौकिक सुख भर गया, जिसका वर्णन शब्दातीत है।



पुजारीजन भक्तों से शांत बैठने और वीडियो न बनाने की अपील करते  हैं, लेकिन भक्त... श्री महाकाल को 
खुद में बसा लेना चाहते हैं... उनमें समा जाना चाहते हैं... कोई मंत्र पढ़ रहा है... कोई जयकारे लगा रहा है.... कोई आंख बंद करके श्री महाकाल से निकलने वाली आशीर्वाद रूपी तरंगों को अपनी आध्यात्मिक तरंगों से जोड़ लेना चाहता है। पुजारी जी की आवाज थोड़ी ऊंची हुई
, तो लोग शांत हो गए। पुजारी जी ने घोषणा की, अब भस्म आरती होगी... महिलाएं न देखें... पर्दा कर लें...। भक्त जो कुछ भी श्री महाकाल को अर्पित करना चाहते हैं, उसे झोले में डाल दें...। श्रीमती जी ने पूछा- महिलाएं भस्म आरती क्यों नहीं देख सकतीं.... मैंने अपने अल्प अध्यात्म ज्ञान से कहा कि श्मशान विधि का नियम यहां भी लागू होता होगा। शास्त्रो में श्मशान में महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध माना गया है, लेकिन मैं इसे तर्क के साथ प्रमाणित नहीं कर सकता।

श्मशान के पुजारी जिन्हें अघोर भी कहा जाता है, भस्म की पोटली के साथ गर्भगृह में दाखिल हुए। उसी पोटली से भस्म आरती शुरू हुई। घंटा-घड़ियाल और डमरू की मिश्रित ध्वनि के बीच भस्म आरती... यह संदेश कि सबकुछ शिव का है और सब शिव के हैं। वह दानी हैं, सर्जक हैं, पालक हैं, संहारक हैं और सृष्टि के समस्त कार्यविधि के नियंता भी... जीवन के शोक और आनंद का अंत मसान है, जहां के भस्म को वह अष्टांग में धारण कर भस्मीभूत होने का संदेश देते हैं... यही जीवन सत्य है... सृष्टि और विनाश का सत्य है...  कुछ भी स्थायी नहीं... न सुख.. न दुख...

भस्म आरती के समापन के बाद महिलाओं को पर्दा हटाने की इजाजत दे दी गई। इसके बाद अन्य आरतियों का सिलिसला शुरू हुआ। एक समय ऐसा आया कि सारी बत्तियां बंद हो गईं और गर्भगृह में आरती की लौ के बीच श्री महाकाल के दर्शन हुए... इस दृश्य ने देवी सती के कायात्याग और शिव तांडव के प्रारंभ की परिस्थियों का आभास कराया। भक्तों के चढ़ावे श्री महाकाल तक पहुंच चुके थे। उनके भोग लगे। अज्ञानतावश हम कुछ नहीं ले जा पाए थे... शायद उनकी यही इच्छा रही होगी... आरती समाप्त हो गई, लेकिन मन वहां से रत्ती भर खिसने के लिए तैयार नहीं था... उसी समय श्री महाकाल के जलाभिषेक की व्यवस्था हो गई। हम सभी ने श्री महाकाल को जल अर्पित किए। उनके स्पर्श से धन्य हो गए...

दो महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन श्री महाकाल दर्शन और इस यात्रा का एक-एक पल 
मस्तिष्क पर अमिट है। स्मृतियां जीवन को रोमांचित करती रहती हैं... ऊर्जा प्रदान करती हैं... शायद यही ऊर्जा जीवन को गति देती है...

जय श्री महाकाल... आपकी जय हो... प्राणियों में सद्भावना हो... विश्व का कल्याण हो...

रविवार, 1 जनवरी 2023

क्षिप्रा माता की संध्या आरती व शक्तिपीठ हरसिद्धि माता

सभी अपनों को नव वर्ष ईसवी सन् 2023 की ढेरों शुभकामनाएं एवं बधाई... महाकाल की कृपा बनी रहे...
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पांच दिसंबर की शाम श्री ओंकारेश्वर से लौटने के बाद हम रामघाट के पास उतर गए। सारथी अभिषेक जी ने बता दिया था कि साढ़े पांच बजे के आसपास आरती शुरू हो जाएगी। हम तय समय से पहले रामघाट पहुंच गए थे। तब वहां मां क्षिप्रा की आरती की तैयारी चल रही थी। पास में तखत रखी हुई थी, जिस पर हम लोग कुछ देर बैठे। इस बीच आरती का माहौल बनने लगा। साजिंदों ने नगाड़ा, डमरू और घंटी के स्वरों को संयोजित करने का प्रयास शुरू कर दिया। करीब 10 मिनट के भीतर नगाड़ा, डमरू, झाल और घंटी की ध्वनियां लोगों के कान में घुलनें लगीं और वे खिंचे हुए घाट की तरफ चले आए। 

नगाड़ा एक बच्चा बजा रहा था और घंटी एक वयस्क। जब वादन का पहला दौर खत्म हुआ तो घंटी बजाने वाले ने बच्चे पर रौब जमाने का प्रयास किया और कहा कि तुम सही से नगाड़ा नहीं बजा रहे हो। दोनों में काफी देर तक बहस हुई, लेकिन बच्चा अपनी जिद पर अड़ गया। नतीजतन, घंटी बजाने वाले ने नाराज होकर मैदान छोड़ दिया। घंटी बजाने की जिम्मेदारी किसी और ने संभाली। थोड़ी देर बाद वादन का दूसरा दौर शुरू हुआ और इसी बीच आरती भी शुरू हो गई। 


इस बार सभी वाद्य यंत्रों के ताल मेल खा रहे थे और आरती की मंद ध्वनि के साथ उनका तारतम्य पूरी तरह बैठ रहा था। मां क्षिप्रा आरती की एक अच्छी बात यह भी थी कि पुजारी जी ने मौजूद सभी श्रद्धालुओं को इसमें शामिल होने का मौका दिया। यानी, आप नदी तट पर जाकर खुद आरती कर सकते हैं। जब आरती चल रही थी, तब एक नृत्यांगना वहां नृत्य करने लगीं। मुझे लगा कि वह पेशेवर होंगी और इसके बहाने कुछ आर्थिक कमाई कर लेती होंगी। लेकिन, जैसे-जैसे वाद्य यंत्रों की ध्वनियां लय पकड़ने लगीं, वैसे-वैसे नृत्यांगना भी उनके लय में घुलने लगीं। आरती की धुन पर इतना मनहर और शालीन नृत्य हमने पहली बार देखा था।

क्षिप्रा आरती के बाद हम पहुंचे शक्तिपीठों में शुमार मां हरसिद्धि मंदिर। यह मंदिर क्षिप्रा नदी और श्री महाकाल मंदिर के बीच है। वहां मां की आरती चल रही थी। रुद्रसागर तालाब के सुरम्य तट पर चारों ओर मजबूत दीवारों से घिरा यह मंदिर कई मायनों में विशेष है। यहां मां सती की प्रतिमा नहीं है, बल्कि उनके शरीर का एक अंश (कोहनी) है। मंदिर के बाहर काफी ऊंचे दो दीप स्तंभ बने हुए हैं, जिनपर शाम में जब दीये जलते हैं तो अनूठी छंटा दिखती है। बताते हैं कि इन सैकड़ों दीयों को जलाने में रोजाना 60 लीटर तेल लगता है। 


जब हम हरसिद्धि माता के मंदिर में पहुंचे, तो वहां आरती चल रही थी। ढोल नगाड़ों की थाप पर अद्भुत स्वरों में आरती की जा रही थी। पंचम स्वर में होने वाली आरती के बोल प्रचलित ही थे, लेकिन गायन का अंदाज निराला होने के कारण लोग उन्हें सहज पकड़ नहीं पा रहे थे। मंदिर में वालेंटियर की संख्या ठीक-ठाक थी, जो लोगों की दर्शन में मदद कर रहे थे। वहां से दर्शन के बाद हम पैदल ही होटल लौट गए। जल्दी सोने का उपक्रम किया, क्योंकि रात 12 बजे श्री महाकाल की भस्म आरती के लिए लाइन में लगना था। (क्रमशः)
    

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

श्री ओंकारेश्वर व श्री ममकेश्वर महादेव

श्री ओमकारेश्वर महादेव मंदिर में पंक्तिबद्ध
चौबीस खंभा माता मंदिर चौराहे पर चाय पीने के बाद हम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शुमार श्री ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन के लिए निकल पड़े। आगरा-मुंबई हाईवे से इंदौर तक जाना था, जहां से श्री ओंकारेश्वर के लिए अलग रास्ता निकलता है। हाईवे के किनारे थोड़ी दूरी पर स्थित पहाड़ियों की ओट से सूर्योदय का दृश्य मन मोह रहा था। धान की कटाई हो चुकी थी, तो खेत लगभग खाली थे। कुछ में सब्जियां आदि लगाई गई थीं। कुछ जगहों पर कपास के खेत भी दिखाई दिए। बचपन में हमने अपने इलाके में कपास के कुछ पौधों व छोटे पेड़ों को देखा था, जिनमें फूल कम ही हुआ करते थे और जो होते थे वे थोड़े बड़े होते थे। यह कपास उससे अलग था। पौधे छोटे थे, फूल खूब लगे हुए थे और छोटे-छोटे फलों में रूई तैयार हो रही थी। इंदौर से जब हम श्री ओंकारेश्वर यानी खंडवा जिले की तरफ बढ़े, तब मिर्च की खेती भी दिखाई दी। कई जगहों पर सड़क किनारे लोग लाल मिर्च बेच भी रहे थे। मन तो खूब हुआ रुककर मिर्च के बारे में जानकारी हासिल करने और कुछ खरीदने का, लेकिन अपने मतलब की नहीं थी, इसलिए मस्तिष्क का निर्णय भारी पड़ गया और हम उन ठीहों को निहारते हुए आगे बढ़ते गए। 

रास्ते में भैरव घाटी आई, जिसके मोड़ काफी तीखे थे। जरा सी सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। हमारे सारथी
अभिषेक यादव जी ने बताया कि घाटी के तीखे मोड़ और संकरी सड़क से निजात पाने के लिए बिल्कुल पास से ही सीधी सड़क बनाई जा रही है। हमने देखा भी कि सड़क निर्माण का काम तेजी से चल रहा है। इंदौर की प्यास बुझाने के लिए श्री ओंकारेश्वर से इंदौर तक बड़ी पाइपलाइन डाली गई है, जिससे नर्मदा नदी का पानी मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी तक पहुंचता है। पाइपलाइन लगभग पूरे रास्ते हमारे समानांतर चलती रही। बीच में रेलवे की मीटरगेज लाइन दिखाई दी। वह रेललाइन अब भी प्रचलन में है और यात्री ट्रेनें इंदौर के पास के एक स्टेशन से खंडवा तक जाती हैं।

अभिषेक जी काफी सुलझे हुए इंसान व कामयाब कारोबारी हैं। उनका टूर एंड ट्रैवल का काम तो है ही, साथ ही और भी कई काम करते हैं। राजनीति में भी रूचि रखते हैं, लेकिन अपना पक्ष जहां तक संभव हो जाहिर नहीं होने देते। मध्य प्रदेश की राजनीति पर बात तो होनी ही थी। मैंने छेड़ दिया- मामाजी कैसा कर रहे हैं। अभिषेक जी ने हंसते हुए कहा- अच्छा कर रहे हैं सर। ज्योतिरादित्य सिंधिया को छोड़ दें, तो उन्हें भाजपा में कोई टक्कर नहीं देने वाला। हालांकि, वे कह चुके हैं कि इस बार वे मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे। ...और राहुल जी की यात्रा, जो दो दिनों पहले ही उज्जैन से गुजरी है... मैंने बीच में काटते हुए कहा। अभिषेक जी खुलकर हंसे और कहा, एमपी में तो उनका कुछ नहीं होने वाला। पार्टी भी अच्छी पोजीशन में नहीं है। धड़ों में बंटी हुई है। उत्तर प्रदेश व बिहार में यादवों का राजनीति में अच्छा-खासा हस्तक्षेप है, लेकिन मध्य प्रदेश में कोई बहुचर्चित यादव चेहरा नहीं दिखाई देता, ऐसा क्यों? अभिषेक जी कहते हैं, दिखाई नहीं देता, लेकिन मंत्री तो हैं। आधा दर्जन से ज्यादा विधायक भी हैं। कई सीटों पर यादव निर्णायक स्थित में हैं, लेकिन यूपी-बिहार की तरह शोर नहीं मचाते।
श्री ओंकारेश्वर महादेव मंदिर के भीतर की नक्काशी 

खेती-बाड़ी, आजीविका व रहन-सहन के मुद्दे पर थोड़ी-थोड़ी बातें होती रहीं और रास्ता कटता रहा। करीब 10 बजे हम श्रीओंकारेश्वर पहुंच गए। नर्मदा नदी के दोनों किनारों पर एक समृद्ध गांव जहां भगवान भोलेनाथ की कृपा प्रत्यक्ष दिखाई देती है। श्री ओंकारेश्वर और आसपास की पूरी अर्थव्यवस्था आस्था पर आधारित है। 
अभिषेक जी ने हमें श्री ममकेश्वर मंदिर के पास छोड़ा और गाड़ी से उतरते ही पंडे पीछे पड़ गए। मैंने उन्हें मीठे शब्दों में टालने की कोशिश की, लेकिन वे दर्शन कराने के लिए न्यूनतम दक्षिणा की शर्त पर उतारू हो गए। आखिरकार मुझे कहना ही पड़ा कि भक्त और भगवान के बीच किसी तीसरे का क्या काम। हम खुद दर्शन कर लेंगे और जितने भी शुद्ध-अशुद्ध मंत्र आते हैं, उन्हीं से भगवान की आराधना कर लेंगे। अभिषेक जी ने बता दिया कि सीढि़यों से नीचे उतर जाइए। मोटरयुक्त नौकाएं मिलेंगी, उन्हीं से नर्मदा पार कर लीजिएगा। हमें लगा कि लोटा खरीद लेना चाहिए, जिससे श्री ओंकारेश्वर महादेव को जल चढ़ा लेंगे। तांबे का लोटा खरीदा और एक छोटा सा केन भी, जिसमें पवित्र नर्मदा का जल संग्रहीत करने की इच्छा थी। नाव जब चली तो हमने लोटे में नर्मदा जल भरने का प्रयास किया, लेकिन धारा इतनी तेज थी कि अपने साथ लोटे को भी बहा ले गई। 

खैर, तट पर उतरते ही पूजन सामग्री वाली दुकान से तीन लोटे मुफ्त में मिल गए, जिन्हें जल चढ़ाने के बाद लौटा
देना था।  पूजन सामग्री की दुकान पर फिर एक बार पंडों ने दर्शन और संकल्प करवाने का प्रस्ताव दिया, जिसे हम विनम्रता से खारिज करते रहे। श्री ओंकारेश्वर मंदिर में लाइन लंबी थी, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं। हमें उम्मीद थी कि आधे घंटे में हमारी बारी आ जाएगी। हुआ भी ऐसा ही। जलाभिषेक के लिए करघा लगा हुआ था, लेकिन कम ही लोग उस करघे में जल अर्पित कर रहे थे। सब ने प्रत्यक्ष रूप से श्री ओंकारेश्वर महादेव को जल अर्पित करने का संकल्प ले रखा था। नर्मादा नदी के तट पर स्थित मंदिर बाहर से जितनी भव्यता लिए है, उससे ज्यादा भव्यता अंदर के शिलास्तंभों पर बारीकी से उकेरी गईं कलाकृतियों पर दिखाई देती हैं, जो सहज ही मन मोह लेती हैं। 

गर्भ गृह अमूमन सभी जगह छोटा होता है, यहां भी कुछ ऐसा ही था। कुछ लोगों ने बताया कि पहले भगवान ओंकारेश्वर महादेव को छूने व जल चढ़ाने की इजाजत थी, लेकिन अब वहां शीशे की दीवार खड़ी कर दी गई है। क्षण मात्र दर्शन और चंद बूंदे अरघे में चढ़ाने का मौका मिलता है और पुजारीगण दूसरों को मौका देने की बात कहकर आगे बढ़ा देते हैं। प्रभु के दरबार में चूंकि सबको मत्था टेकने का मौका मिलना चाहिए, इसलिए क्षण मात्र भी अपने हिस्से आना बेहद सौभाग्य की बात है। दर्शन से तृप्त होकर हम बाहर निकले। अभिषेक जी ने बता दिया था कि झूला पुल से आप लौट सकते हैं और श्री ममकेश्वर महादेव के दर्शन के बाद वापस उज्जैन के लिए निकल चलेंगे। 


हम झूला पुल की तरफ बढ़े तो एक महिला को ताजे अमरूद बेचते देखा। थोड़ा चकित रह गया, जब जाना कि उनके पास तीन पाव के बाट थे। उन्होंने किसी प्रकार दो किलो अमरूद तौला। अब समस्या आई कि हमारे पास थैली नहीं थी। खैर, पास के एक दुकानदार ने थैली उपलब्ध करवा दी। श्री ममकेश्वर महादेव के पहले एक दुकान पर प्रसाद खरीदने के बाद अपने सारे सामान वहीं रख दिया। दुकान चलाने वाली महिला ने बताया कि श्री ममकेश्वर व श्री ओंकारेश्वर मिलकर एक ज्योतिर्लिंग बनते हैं। 

श्री ममकेश्वर महादेव के दर्शन के लिए ज्यादा लंबी कतार नहीं थी। लगभग 15 मिनट में हमारा नंबर आ गया।
वहां न सिर्फ शिवलिंग पर जल चढ़ाने का मौका मिला, बल्कि बिलपत्र व अन्य पूजन सामग्री भी तसल्ली से चढ़ा पाया। श्री ओंकारेश्वर व श्री ममकेश्वर महादेव के दिव्य दर्शन व पूजन-अर्चन का आलौकिक आनंद प्राप्त कर हम करीब दो बजे के आसपास फारिग हुए। लौटते वक्त श्री ओंकारेश्वर के पास ही एक लाइन होटल में अभिषेक जी ने गाड़ी रोक दी। बहुत लजीज भोजन मिला, वह भी पूरी सफाई के साथ। उज्जैन से लौटते वक्त नींद सभी लोगों पर हावी होने लगी थी। अभिषेक जी को छोड़कर सभी ने झपकी ली। शाम करीब साढ़े पांच बजे हम उज्जैन लौट आए... (क्रमशः)

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

श्री महाकाल और चौबीस खंभा माता

चार दिसंबर, 2022 को अवंतिकानाथ श्री महाकाल के प्रथम अलौकिक दर्शन और श्री महाकाल लोक की भव्यता देख प्रफुल्लित मन से हम सभी जल्दी सो गए। पांच दिसंबर को सुबह करीब साढ़े चार बजे उठे और जल्दी-जल्दी तैयार होने लगे। पांच बजे फोन मिलाया तो अभिषेक यादव जी भी तैयार हो रहे थे। आधे घंटे उनका फोन आया कि होटल के पास जाम न लग जाए, इसलिए मैंने गाड़ी चौराहे पर पार्क कर दी है। पास में ही मंदिर है, किसी से पूछ लीजिएगा बता देगा। 

चौबीस खंभा माता मंदिर के पास मां, पत्नी व देवांश...

पुरुष सदस्य, यानी मैं और देवांश तैयार हो चुके थे, तो सोचा यात्रा से पहले थोड़ी-थोड़ी चाय पी ली जाए। तैयारियों के बीच उस चौराहे और मंदिर का नाम भूल गया, जिसके बारे में अभिषेक जी ने बताया था। अपने होटल से बाहर निकला, तो एक दुकान पर कुछ लोग खड़े दिखाई दिए। मैंने देवांश को उन लोगों से बारह खंभा माता मंदिर के बारे में पूछने को कहा। बताने वाले भी काफी दिलचस्प थे। उन्होंने उल्टा सवाल दाग दिया, तुम्हें जाना कहां है। बारह खंभा माता मंदिर या चौबीस खंभा माता मंदिर। देवांश दुविधा में दिखाई दिए, तो पीछे से मैंने कहा- कुछ श्योर नहीं हूं। ऐसा कोई मंदिर है, आप ही बता दीजिए... प्लीज।

मेरे बैकफुट पर आता देख उन सज्जन का अंदाज-ए-बयां और दिलचस्प हो गया। अमां यार, बारह खंभे क्यों घटा दिए भाई। उनका खंभा तो मुगलों व अंग्रेजों तक नहीं तोड़ पाए और तुम सीधा बारह खंभा कम कर दिए भाई यार। ये तो ठीक नहीं है भाई यार... इससे पहले कि वह रौ में कुछ और कह पाते, एक अन्य सज्जन ने बीच में ही कहा- आप नीचे उतर जाओ और दाएं मुड़ जाना। वहीं माता का मंदिर है। सुबह की शुरुआत दिलचस्प हुई थी। माता मंदिर के पास पहुंचा तो अभिषेक जी से मुलाकात हुई। हम चौबीस खंभा माता मंदिर के पास ही खड़े थे। मंदिर किसी पुराने किले का द्वार जैसा था, जिसके ऊपर के हिस्से थोड़े क्षतिग्रस्त हो गए थे। बड़ा सा ग्लो साइनबोर्ड लगा हुआ था, जिसके कारण हम सुबह उस क्षतिग्रस्त हिस्से को नहीं देख पाए।

पास में ही एक बुजुर्ग चाय की टपरी लगाए हुए थे। सोचा, जबतक महिलाएं गाड़ी तक पहुंचती हैं, तबतक थोड़ी-थोड़ी चाय पी ली जाए। अमूमन फीकी चाय बनाने में दुकानदार ना-नुकुर करते हैं, लेकिन वे एक कप फीकी चाय बनाने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गए। चाय भी लाजवाब थी। दो कप लगातार पी ली। फ्लास्क भरवा लिया और देवांश की मां भी चाय पीकर खुश हो गईं। वह मुझसे ज्यादा चाय की शौकीन हैं। चाय पीने के क्रम में बुजुर्गवार ने बताया कि चौबीस खंभा माता मंदिर की महिमा का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि महाराज विक्रमादित्य भी महाष्टमी के दिन के भंडारे का प्रसाद खुद पकाते थे। उन्हें बड़ी माता व छोटी माता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। वह परंपरा आज भी कायम है। आज भी जिले के कलेक्टर महाष्टमी के दिन खुद भंडारे का प्रसाद बनाते हैं। शारदीय व चैत्र नवरात्र, दोनों में। पहले यही श्री महाकाल मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार होता था, लेकिन अब इसके पीछे उज्जैन का मुख्य बाजार, यूं कहें मंडी बस गई है।

हमें ओंकारेश्वर व ममकेश्वर महादेव के दर्शन की जल्दी थी। श्री ओंकारेश्वर महादेव द्वादश ज्योतिर्लिंग में शुमार हैं। अभिषेक जी ने बताया कि दोपहर में श्री ओंकारेश्वर महादेव का कपाट एक घंटे के लिए बंद हो जाता है, इसलिए बेहतर होगा कि हम जल्दी वहां पहुंच जाएं। निकलते थोड़ी देर हो गई थी और कुछ दूर तक सड़क भी खराब थी, इसलिए पहुंचने में 10 बज गए। बीच में अभिषेक जी से मध्य प्रदेश की संस्कृति और राजनीति पर लंबी वार्ता हुई, जिस पर अगली कड़ी में चर्चा करेंगे। फिलहाल, इतना कि चौबीस खंभा माता मंदिर के बारे में गूगल पर जानकारी हासिल करने का प्रयास किया तो कुछ ज्यादा जानकारी हासिल नहीं हो सकी। महाराज विक्रमादित्य के काल व श्री महाकाल मंदिर के इतिहास में साम्य को लेकर मतभेद सामने आया, लेकिन एक तथ्य ज्यादातर जगहों पर समान मिला कि मंदिर की दोनों माताएं महामाया व महाल्या हैं। शक्ति स्वरूपा दोनों माताओं को श्री महाकाल वन और नगरी का रक्षक माना जाता है। हम इतिहास और आस्था की तुलना नहीं कर रहे, क्योंकि जब भी ऐसी स्थिति आएगी इतिहास को हारना होगा। जन आस्था के आगे इतिहास कई बार बौना पड़ जाता है। वैसे भी, सनातन संस्कृति व परंपरा इतनी पुरानी और विशाल है कि कागज के पन्नों में उन्हें दर्ज कर पाना कभी भी सहज नहीं हो पाएगा। इसीलिए, हमारे वेद जैसे पुरातन ग्रंथों को श्रुति कहा जाता है। श्रुति यानी श्रव्य यानी सुना हुआ। हमारी परंपरा व आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई आक्रांताओं के बावजूद यह हजारों हजार साल पुरानी श्रुति परंपरा न सिर्फ पूरी आन-बान-शान से जिंदा है, बल्कि पुष्पित-पल्लवित हो रही है... (क्रमशः)

 

रविवार, 18 दिसंबर 2022

एक साध का पूरा होना... श्री महाकाल कृपा बनाए रखें...!

श्री महाकाल दरबार 
कोविड-19 की भीषण आपदा के कारण सामान्य जनजीवन की कई गतिविधियां बंद हो गई थीं। उन्हीं में एक था-पर्यटन। मैं अपनी गिनती उत्कंठ पर्यटकों में नहीं करता, लेकिन घूमने-फिरने, खासकर धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों पर जाने और उनके बारे में जानने से मन को शांति मिलती है। श्री महाकाल के दरबार में सपरिवार शीश नवाने की दिली इच्छा थी। लंबे समय से यह कामना मन में दबी हुई थी। अक्टूबर में प्रभु की प्रेरणा से इच्छी बलवती हुई और इधर-उधर से थोड़ी सी जानकारी हासिल करने के बाद पूरे परिवार का टिकट करवा लिया। मित्र श्री सूर्यनारायण जी की मदद से अन्य व्यवस्थाएं हो गईं।
चार दिसंबर, 2022 को इंदौर एक्सप्रेस से दिल्ली से उज्जैन पहुंचे। शाम में बाबा श्री महाकाल के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐेसे लगा जैसे जीवन धन्य हो गया हो... मन-मस्तिष्क में अपरिमित ऊर्जा का संचार हुआ। पूरा परिवार गदगद था। सूर्यास्त के बाद नवनिर्मित श्री महाकाल लोक में बत्तियां जल उठीं। अभी श्रीमहाकाल लोक के दो अन्य चरणों का निर्माण कार्य चल रहा है, इसलिए प्रवेश करते वक्त उस वैभव का एहसास भी नहीं कर सका, जिसका कुछ ही क्षण बाद साक्षी बनने वाला था। करीब 200 कदम चलने के बाद श्रीमहाकाल लोक के वैभव की पहली झलक दिखाई दी। दरअसल, यही श्रीमहाकाल लोक का मुख्य प्रवेश द्वार था और हमने जिस द्वार के प्रवेश किया था वह धाम का पिछला हिस्सा यानी प्रवेश द्वार संख्या चार था। 
 श्रीमहाकाल लोक में सनातन संस्कृति को सहेजने और उन्हें भव्यता प्रदान करने का बेहतरीन काम हुआ है। यह श्रीमहाकाल लोक का पहला चरण है और उसकी भव्यता मन को छू जाती है। दो और चरणों पर काम तेजी से चल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो चरणों के पूरा होने के बाद श्रीमहाकाल लोक का वैभव अप्रतिम हो जाएगा। माताजी  बुजुर्ग हैं और यात्रा के कारण हम भी थके हुए थे, इसलिए श्रीमहाकाल लोक के प्रथम चरण के अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाए। बीच से ही लौटने के क्रम में भारत माता मंदिर के दर्शन हुए। अगले दिन सुबह करीब 150 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित एक अन्य ज्योतिर्लिंग बाबा ओंकारेश्वर व ममकेश्वर के दर्शन के लिए रवाना होना था, तो हम सभी खाना खाने के बाद जल्दी सो गए। 
(क्रमशः )
श्री महाकाल लोक 


श्री महाकाल परिसर 




श्री महाकाल लोक
 
श्री महाकाल लोक

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

अंकों की दौड़ और जीवन के अनुभव

-कुणाल देव-

सीबीएसई 10वीं व 12वीं के परीक्षा परिणाम आ चुके हैं। बच्चे उत्साहित हैं और उनसे भी ज्यादा खुश हैं उनके माता-पिता व परिजन। यह बहुत स्वभाविक भी है। हम में से ज्यादतर जिस पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां हमारी पीढ़ी तक प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड का ही बोलबाला था। समुद्र जैसा पाठ्यक्रम, स्कूलों में शिक्षकों की घोर कमी और बहुत ही कंजूसी के साथ मूल्यांकन तब प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड की पहचान हुआ करती थी। सारा दोष व्यवस्था पर मढ़ देना अर्धसत्य होगा। हम में से ज्यादतर लोग बेफिक्र भी कुछ ज्यादा ही होते थे। माता-पिता की अपेक्षा भी कुछ ज्यादा नहीं थी। मैट्रिक व इंटर की परीक्षा पास होने को ही बड़ा गौरव मान लेते थे। जिनके बच्चों ने फर्स्ट डिवीजन हासिल कर लिया, वे तो बल्लियों उछल जाते थे। 

मैट्रिक की परीक्षा शिक्षा का पहला फिल्टर होता था। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले किसान परिवार के ज्यादातर बच्चे अर्थाभाववश या स्वभावश किताबों का झोला खूंटी में टांगकर खेतों की तरफ निकल पड़ते थे। इंटरमीडिएट में नाम लिखाने वाले छात्र दो प्रकार के होते थे-एक तो वह जिन्हें वास्तव में पढ़ाई से लगाव था और दूसरा वह जिनके माता-पिता चाहते थे कि बच्चा आगे पढ़ ले। इंटरमीडिएट के दूसरे फिल्टर में दूसरे प्रकार के छात्र छंट जाते थे और खेतों या दुकानों की ओर लौटकर पैतृक विरासत संभालने लगते थे। पहले वाले छात्र थर्ड और सेकेंड डिवीजन के साथ आगे की पढ़ाई जारी रखते थे। कुछ फर्स्ट डिवीजन भी ले आते थे, लेकिन उनकी संख्या नगण्य होती थी। ग्रेजुएशन की पढ़ाई के बाद ज्यादातर छात्र प्रतियोगिता परीक्षाओं में लग जाते थे। यहीं से शुरू हो जाता था क्लर्क से कलक्टर बनने का सफर। जो कलक्टर बन गए वे तो उदाहरण हो ही जाते थे, जो सफल नहीं हो पाए उनकी भी कहानियां कई मौकों पर लोग पूरे जोश के साथ सुनाई जाती थीं।

आज प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड से पढ़ाई करने वालों के बच्चे सीबीएसई व आइसीएसई से संबद्ध स्कूलों से पढ़ाई कर रहे हैं। ये बोर्ड मूल्यांकन में कंजूसी कतई नहीं करते और एक तरह से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा ही देते हैं। बढ़ती आबादी व सीमित होते संसाधनों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जरूरत भी है, वर्ना प्रतिभा के मूल्यांकन का विकल्प ही क्या है। सच कहूं तो आजकल के बच्चे भी हमारी पीढ़ी से ज्यादा प्रतियोगी हो गए हैं और कई बार महसूस होता है कि शिक्षा व करियर की कड़ी प्रतियोगिता ने उन्हें जीवन के व्यावहारिक पहलुओं से थोड़ा जुदा कर दिया है। शहरों, खासकर महानगरों में रह रहे छात्रों की दुनिया कीताबों से शुरू होती है और सोशल मीडिया पर खत्म हो जाती है। राशन की दुकान से लेकर खेत-खलिहान, नदी-नाले व पर्वत-पठार तक के बारे में उनका अनुभव इन्हीं माध्यमों पर आधारित है। इन्हीं अवस्थाओं ने ग्राम्य पर्यटन की संभावनाओं को जन्म दिया है। शायद उसी तरह, जिस तरह पारिवारिक व सामाजिक बिखराव ने वृद्धाश्रम को जन्मा है।

रविवार, 20 जून 2021

तीन चौथाई: तीन चौथाई स्मृति की रेखाएं

तीन चौथाई: तीन चौथाई स्मृति की रेखाएं: ...ताकि कहना न पड़े कि जमाना बदल गया आप सभी आदरणीय जन के आशीर्वाद और प्रिय साथियों की दुआओं का असर है कि दिमाग में जमा अवसाद का लावा अब पि...

रविवार, 14 जून 2020

‘छिछोरे’ ऐसे तो नहीं होते सुशांत

हॉटस्टार पर मुफतिया मूवी की श्रेणी में बार-बार ‘छिछोरे’ हाईलाइट हो रही थी। चिकट फिलिमची हूं। घटिया से घटिया फिल्में देख लेता हूं और उनसे अपने मतबल की चीजें निकाल लेता हूं। लेकिन, ‘छिछोरे’ देखने का लंबे समय तक मन नहीं बना पाया। एक तो शायद पब्लिसिटी कम होने के कारण इसका नाम गौर से सुन नहीं पाया था और दूसरा यह मान बैठा था कि जिस फिल्म का नाम इतना घटिया होगा वह फिल्म कैसी होगी। खैर, हर रोज इस फिल्म का पोस्टर देख-देखकर एक दिन जिज्ञासावश उस पर क्लिक कर दिया। मैं यह जानना चाह रहा था कि जिस फिल्म में सुशांत और श्रद्धा हों, उसे युवा पीढ़ी ने खारिज किन कारणों से कर दिया।
श्रद्धांजलि
      फिल्म शुरू हुई, लेकिन शुरुआत भी उतनी दिलचस्प नहीं थी। फिर भी अब पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। जब फिल्म देखनी शुरू की थी तो रात के तीन बज रहे थे। ऊंघ रहा था, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई नींद आंखों से दूर होती गई। हालांकि, फिल्म आज के दर्शकवर्ग के हिसाब से थोड़ी स्लो थी। तथ्य और कथ्य का प्रस्तुतीकरण भी उतना प्रभावी नहीं था, लेकिन उसका विषय और सुशांत के अभिनय ने मुझे भटकने नहीं दिया। फिर तो अपने कॉलेज के दिनों से लेकर अपने बेटे के स्कूली दिनों को एक साथ जी लिया।
      सूरज की लाली दिखने लगी थी और फिल्म अवसान की ओर बढ़ने लगा था। जब फिल्म खत्म हुई तब मैंने तय किया था कि परीक्षा खत्म होने के बाद अपने बेटे को जरूर दिखाऊंगा। भले ही फिल्म की कई बातें हमारी भारतीय मर्यादा के हिसाब से नहीं थीं, लेकिन इसमें वही सारी चीजें थीं जो आज समाज में होती हैं। इसलिए मेरा मानना था कि जिस किसी का भी बच्चा 12वीं की परीक्षा दे रहा हो या दे चुका हो उसे ‘छिछोरे’ जरूर दिखाना चाहिए।
      भाई सुशांत, यूं तो जाने वाले से शिकायत की कोई परंपरा हमारे यहां नहीं, लेकिन तुम्हारी ‘छिछोरे’ ने मुझे यह अधिकार दे दिया है। प्रिय भाई, आज तुमने जो किया उसके बाद तुम क्या बता सकते हो कि मेरे जैसा रूढि़यों से लड़ने वाला पिता भी अपने बेटे का साथ तुम्हारी ‘छिछोरे’ देखना चाहेगा। कई पो चे में तुम्हारी भूमिका इतनी सहज थी, जैसे सारी घटनाएं आंखों के सामने हो रही हों। धौनी को तुमने पर्दे पर हूबहू उतार दिया। इतने लोग तुम्हें चाहते थे। जिस समाज से तुम आते थे उसके लिए तुम बेहद सफल इंसान थे। फिर तुमने ऐसा क्यों किया। बहुत गहरा जख्म दे गए भाई। तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। खैर, मुझे यकीन है कि तुम अपने अभियन से देवलोक को भी जीत लोगे।
  • कुणाल देव

शुक्रवार, 22 मई 2020

शाख से टूटे हुए पत्तों का कोई सहारा नहीं होता...

-कुणाल देव-

पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मुंबई, दिल्ली या कोलकाता... आज कामगारों की दशा एक जैसी है। भूखे पेट और नंगे पांव सिर पर मोटरी लादकर बाल-बच्चों के साथ पैदल ही गांव-घर लौट रहे कामगारों की व्यथा-कथा पत्थरदिल को भी मोम बना दे रही है। उनके घर लौटने की कहानी बेहद दुख है, लेकिन घर वापसी के बाद की चिंता उससे भी ज्यादा गंभीर। समझना मुश्किल नहीं कि अगर गांव में जीने का अवलंब होता तो ये कामगार हजारों किलोमीटर दूर अपनी रोटी क्यों तलाशते। फिर इन लाखों कामगारों के आने से जहां शहरों की आर्थिक व सामजिक व्यवस्था बदल गई, वहीं इनके न रहने से गांवों की व्यवस्था ने भी नया आकार ले लिया है। मिट्टी को छोड़कर जिस प्रकार कामगारों ने लोहे के कल-कारखानों को रोटी का जरिया बना लिया, उसी प्रकार गांव के बचे-खुचे किसानों ने भी जीव-जंतुओं की बजाय अपने दरवाजे पर मशीनों को खड़ा कर दिया। खुलकर कहें तो ये कामगार जिस जिंदगी और रोटी की उम्मीद में गांव लौट रहे हैं, वहां भी अब इसकी गुंजाइश कम रह गई है। किसानों का दिल बड़ा है। अपनी रोटी बांटना और बेबसों को सहारा देना उनकी परंपरा है। लेकिन, यह भी सच है कि जब खुद का पेट भरा हो तभी दान-पुण्य अच्छा लगता है। भूखे पेट दान करने वाले विरले होते हैं।

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जड़ों की ओर-3
         कामगारों की गांव वापसी का रेला आज दुनिया देख रही है, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि पिछले 30-35 वर्षों में धीरे-धीरे उनके पलायन ने एक समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर ही तोड़ दी थी। कृषक पुत्र हूं। खुद किसानी भी की है। इसलिए, अपना वास्ता भोगे हुए यथार्थ से ही है। हम आदर्शोन्मुख यथार्थ की तो कल्पना भी नहीं कर सकते। बचपन में हमने अपने घर में बड़े-बड़े छह बैल, चार-चार मुर्रा भैसें और देसी गायों को निहारा है। मध्यम श्रेणी के किसान के लिए यह गौसंपदा पर्याप्त थी। खेती-गृहस्थी का काम सालोंभर चलता था। इसलिए, दो लोगों को सालभर का रोजगार भी मिला हुआ था। आठ महीने खेती का मौसम होता था और उन दिनों में रोजना औसतन छह-आठ लोगों की जरूरत होती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो एक मध्यम श्रेणी का किसान पांच-छह लोगों के लिए सालोंभर का रोजगार पैदा करता था। यह बात दूसरी है कि खेती-किसानी में दूसरे कामों की तरह चमक-धमक नहीं थी।
बचपन में हमारे घर के प्रमुख सहायक थे- चंदेव राम। उनसे पहले और भी लोग रहे ही होंगे, लेकिन कुछ खास याद नहीं। हम उन्हें चंदेव चाचा या काका कहते थे। मेरे बाबाजी उन्हें बहुत मानते थे। इसलिए, बड़े पापा और पापा भी उनकी बात नहीं काटते थे। चंदेव चाचा का परिवार रहता भी था हमारे घर के बगल में ही। उनकी पांच संतानें हैं- तीन बेटियां और दो बेटे। नाती-पोता की संख्या के बारे में सही अंदाजा नहीं है। चंदेव चाचा के पास खेत नहीं था। इसलिए आय का कोई दूसरा स्रोत नहीं था। हमारे दूसरे प्रमुख सहयोगी नंदकिशोर काका की भी ऐसी ही स्थिति थी। लेकिन, दोनों ही सहयोगियों को परिवार चलाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। बेटे-बेटियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी बहुत अच्छे से निभाया। चंदेव काका के बड़े बेटे यानी बनौधी भइया प्राइमरी स्कूल के मास्टर बने और हेडमास्टर होकर रिटायर हुए। बेटियां भी अच्छे घरों में ब्याही गईं। नाती-पोता भी योग्य स्थान पर हैं। सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन करीब 30-35 साल पहले वक्त ने करवट बदला।

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       चंदेव चाचा की उम्र बढ़ती जा रही थी और घर की जिम्मेदारियों का बोझ बनौधी भइया संभालने लगे थे। इसलिए, उन्होंने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी। नंदकिशोर काका भी बाद  में रिटायर हो गए। हवा का रुख बदलने लगा था। गांव के कुछ युवक पंजाब भाग गए। कुछ दिनों बाद लौटे तो उनके शरीर पर पॉलिस्टर का चमचमाता कपड़ा, हाथों में ट्रांजिस्टर और बालों में सुगंधित तेल था। गांव के दूसरे मेहनतकश युवकों और लोगों को उनकी तरक्की भा गई। कुछ दिनों बाद जब पंजाब की कमाई खत्म हुई तो गांव के महाजन से ब्याज पर रुपये लेकर वे युवक लौटने लगे। गांव के कुछ और लोग भी उनके साथ हो लिए। काम पंजाब में भी किसानी का ही था, लेकिन मेहनताना के रूप में नकदी मिलती थी। कुछ दूसरी सुविधाएं भी। कुछ लोग तो वहां रुक गए, लेकिन कुछ लौट आए। जो लौट आए उनका गांव में कहां मन लगने वाला था। फिर दिल्ली, मुंबई और गुजरात की ओर निकल गए। औद्योगिक क्रांति का दौर था। उद्योग-धंधे तेजी से पनप रहे थे। इसलिए, इन महानगरों में कामगारों की पूछ थी। गांव में खेतिहर श्रमिकों की कमी की सबसे ज्यादा मार छोटे किसानों पर पड़ी। श्रमिकों की मुश्किलें और कृषि कार्य पर बढ़ती लागत का बोझ न उठा सकने वाले छोटे किसानों ने किसानी से तौबा करते हुए मजदूरी का दामन थाम लिया। बिल्कुल, प्रेमचंद के गोदान के गोबर की तरह।
           खेती घाटे का सौदा तो थी ही, एक समय ऐसा भी आया कि वह बोझ बनने लगी। जिन किसानों के घरों में सदस्यों की संख्या ज्यादा थी, उन्होंने अपनी खेती बचाने के लिए कुछ सदस्यों को फैक्ट्रियों में काम करने के लिए भेज दिया। उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान... लोकोक्ति झूठी साबित होने लगी। लेकिन, अनाज का विकल्प कहां तैयार होने वाला था। पैसे कमाने के बाद भी उससे पेट कहां भरने वाला था। यह बात भारत को उद्योगों के जरिये विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने की कोशिश कर रहे नीति नियामकों को धीरे-धीरे समझ में आने लगी। गांव पर ध्यान दिया जाने लगा। सरकारें उद्योगों से छीनकर किसानों को श्रमिक लौटा नहीं सकती थीं, इसलिए खेती में मशीनों को लगा दिया। ट्रैक्टर ने दरवाजे से बैलों को गायब कर दिया। खेतों की जुताई आसान हो गई। किसानों की समस्या थोड़ी कम हुई। लेकिन, रोपाई, बोआई और कटाई की  समस्या अपनी जगह बनी रही। फिर हारवेस्टर युग आया। कृषि उपकरणों पर छूट और सब्सिडी ने यंत्रों को किसानों के दरवाजे तक पहुंचा दिया और आज किसानी यंत्रजनित हो गई है। यानी, अब किसानी में श्रमिकों की उपयोगिता बेहद कम रह गई है। ऐसे में इतनी संख्या में कामगारों को खेती में समायोजित करना असंभव सा प्रतीत होता है और डर लगता है कि गांवों में कहीं भगदड़ की स्थिति पैदा न हो जाए।

समाप्त