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रविवार, 1 जनवरी 2023

क्षिप्रा माता की संध्या आरती व शक्तिपीठ हरसिद्धि माता

सभी अपनों को नव वर्ष ईसवी सन् 2023 की ढेरों शुभकामनाएं एवं बधाई... महाकाल की कृपा बनी रहे...
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पांच दिसंबर की शाम श्री ओंकारेश्वर से लौटने के बाद हम रामघाट के पास उतर गए। सारथी अभिषेक जी ने बता दिया था कि साढ़े पांच बजे के आसपास आरती शुरू हो जाएगी। हम तय समय से पहले रामघाट पहुंच गए थे। तब वहां मां क्षिप्रा की आरती की तैयारी चल रही थी। पास में तखत रखी हुई थी, जिस पर हम लोग कुछ देर बैठे। इस बीच आरती का माहौल बनने लगा। साजिंदों ने नगाड़ा, डमरू और घंटी के स्वरों को संयोजित करने का प्रयास शुरू कर दिया। करीब 10 मिनट के भीतर नगाड़ा, डमरू, झाल और घंटी की ध्वनियां लोगों के कान में घुलनें लगीं और वे खिंचे हुए घाट की तरफ चले आए। 

नगाड़ा एक बच्चा बजा रहा था और घंटी एक वयस्क। जब वादन का पहला दौर खत्म हुआ तो घंटी बजाने वाले ने बच्चे पर रौब जमाने का प्रयास किया और कहा कि तुम सही से नगाड़ा नहीं बजा रहे हो। दोनों में काफी देर तक बहस हुई, लेकिन बच्चा अपनी जिद पर अड़ गया। नतीजतन, घंटी बजाने वाले ने नाराज होकर मैदान छोड़ दिया। घंटी बजाने की जिम्मेदारी किसी और ने संभाली। थोड़ी देर बाद वादन का दूसरा दौर शुरू हुआ और इसी बीच आरती भी शुरू हो गई। 


इस बार सभी वाद्य यंत्रों के ताल मेल खा रहे थे और आरती की मंद ध्वनि के साथ उनका तारतम्य पूरी तरह बैठ रहा था। मां क्षिप्रा आरती की एक अच्छी बात यह भी थी कि पुजारी जी ने मौजूद सभी श्रद्धालुओं को इसमें शामिल होने का मौका दिया। यानी, आप नदी तट पर जाकर खुद आरती कर सकते हैं। जब आरती चल रही थी, तब एक नृत्यांगना वहां नृत्य करने लगीं। मुझे लगा कि वह पेशेवर होंगी और इसके बहाने कुछ आर्थिक कमाई कर लेती होंगी। लेकिन, जैसे-जैसे वाद्य यंत्रों की ध्वनियां लय पकड़ने लगीं, वैसे-वैसे नृत्यांगना भी उनके लय में घुलने लगीं। आरती की धुन पर इतना मनहर और शालीन नृत्य हमने पहली बार देखा था।

क्षिप्रा आरती के बाद हम पहुंचे शक्तिपीठों में शुमार मां हरसिद्धि मंदिर। यह मंदिर क्षिप्रा नदी और श्री महाकाल मंदिर के बीच है। वहां मां की आरती चल रही थी। रुद्रसागर तालाब के सुरम्य तट पर चारों ओर मजबूत दीवारों से घिरा यह मंदिर कई मायनों में विशेष है। यहां मां सती की प्रतिमा नहीं है, बल्कि उनके शरीर का एक अंश (कोहनी) है। मंदिर के बाहर काफी ऊंचे दो दीप स्तंभ बने हुए हैं, जिनपर शाम में जब दीये जलते हैं तो अनूठी छंटा दिखती है। बताते हैं कि इन सैकड़ों दीयों को जलाने में रोजाना 60 लीटर तेल लगता है। 


जब हम हरसिद्धि माता के मंदिर में पहुंचे, तो वहां आरती चल रही थी। ढोल नगाड़ों की थाप पर अद्भुत स्वरों में आरती की जा रही थी। पंचम स्वर में होने वाली आरती के बोल प्रचलित ही थे, लेकिन गायन का अंदाज निराला होने के कारण लोग उन्हें सहज पकड़ नहीं पा रहे थे। मंदिर में वालेंटियर की संख्या ठीक-ठाक थी, जो लोगों की दर्शन में मदद कर रहे थे। वहां से दर्शन के बाद हम पैदल ही होटल लौट गए। जल्दी सोने का उपक्रम किया, क्योंकि रात 12 बजे श्री महाकाल की भस्म आरती के लिए लाइन में लगना था। (क्रमशः)
    

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

श्री महाकाल और चौबीस खंभा माता

चार दिसंबर, 2022 को अवंतिकानाथ श्री महाकाल के प्रथम अलौकिक दर्शन और श्री महाकाल लोक की भव्यता देख प्रफुल्लित मन से हम सभी जल्दी सो गए। पांच दिसंबर को सुबह करीब साढ़े चार बजे उठे और जल्दी-जल्दी तैयार होने लगे। पांच बजे फोन मिलाया तो अभिषेक यादव जी भी तैयार हो रहे थे। आधे घंटे उनका फोन आया कि होटल के पास जाम न लग जाए, इसलिए मैंने गाड़ी चौराहे पर पार्क कर दी है। पास में ही मंदिर है, किसी से पूछ लीजिएगा बता देगा। 

चौबीस खंभा माता मंदिर के पास मां, पत्नी व देवांश...

पुरुष सदस्य, यानी मैं और देवांश तैयार हो चुके थे, तो सोचा यात्रा से पहले थोड़ी-थोड़ी चाय पी ली जाए। तैयारियों के बीच उस चौराहे और मंदिर का नाम भूल गया, जिसके बारे में अभिषेक जी ने बताया था। अपने होटल से बाहर निकला, तो एक दुकान पर कुछ लोग खड़े दिखाई दिए। मैंने देवांश को उन लोगों से बारह खंभा माता मंदिर के बारे में पूछने को कहा। बताने वाले भी काफी दिलचस्प थे। उन्होंने उल्टा सवाल दाग दिया, तुम्हें जाना कहां है। बारह खंभा माता मंदिर या चौबीस खंभा माता मंदिर। देवांश दुविधा में दिखाई दिए, तो पीछे से मैंने कहा- कुछ श्योर नहीं हूं। ऐसा कोई मंदिर है, आप ही बता दीजिए... प्लीज।

मेरे बैकफुट पर आता देख उन सज्जन का अंदाज-ए-बयां और दिलचस्प हो गया। अमां यार, बारह खंभे क्यों घटा दिए भाई। उनका खंभा तो मुगलों व अंग्रेजों तक नहीं तोड़ पाए और तुम सीधा बारह खंभा कम कर दिए भाई यार। ये तो ठीक नहीं है भाई यार... इससे पहले कि वह रौ में कुछ और कह पाते, एक अन्य सज्जन ने बीच में ही कहा- आप नीचे उतर जाओ और दाएं मुड़ जाना। वहीं माता का मंदिर है। सुबह की शुरुआत दिलचस्प हुई थी। माता मंदिर के पास पहुंचा तो अभिषेक जी से मुलाकात हुई। हम चौबीस खंभा माता मंदिर के पास ही खड़े थे। मंदिर किसी पुराने किले का द्वार जैसा था, जिसके ऊपर के हिस्से थोड़े क्षतिग्रस्त हो गए थे। बड़ा सा ग्लो साइनबोर्ड लगा हुआ था, जिसके कारण हम सुबह उस क्षतिग्रस्त हिस्से को नहीं देख पाए।

पास में ही एक बुजुर्ग चाय की टपरी लगाए हुए थे। सोचा, जबतक महिलाएं गाड़ी तक पहुंचती हैं, तबतक थोड़ी-थोड़ी चाय पी ली जाए। अमूमन फीकी चाय बनाने में दुकानदार ना-नुकुर करते हैं, लेकिन वे एक कप फीकी चाय बनाने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गए। चाय भी लाजवाब थी। दो कप लगातार पी ली। फ्लास्क भरवा लिया और देवांश की मां भी चाय पीकर खुश हो गईं। वह मुझसे ज्यादा चाय की शौकीन हैं। चाय पीने के क्रम में बुजुर्गवार ने बताया कि चौबीस खंभा माता मंदिर की महिमा का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि महाराज विक्रमादित्य भी महाष्टमी के दिन के भंडारे का प्रसाद खुद पकाते थे। उन्हें बड़ी माता व छोटी माता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। वह परंपरा आज भी कायम है। आज भी जिले के कलेक्टर महाष्टमी के दिन खुद भंडारे का प्रसाद बनाते हैं। शारदीय व चैत्र नवरात्र, दोनों में। पहले यही श्री महाकाल मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार होता था, लेकिन अब इसके पीछे उज्जैन का मुख्य बाजार, यूं कहें मंडी बस गई है।

हमें ओंकारेश्वर व ममकेश्वर महादेव के दर्शन की जल्दी थी। श्री ओंकारेश्वर महादेव द्वादश ज्योतिर्लिंग में शुमार हैं। अभिषेक जी ने बताया कि दोपहर में श्री ओंकारेश्वर महादेव का कपाट एक घंटे के लिए बंद हो जाता है, इसलिए बेहतर होगा कि हम जल्दी वहां पहुंच जाएं। निकलते थोड़ी देर हो गई थी और कुछ दूर तक सड़क भी खराब थी, इसलिए पहुंचने में 10 बज गए। बीच में अभिषेक जी से मध्य प्रदेश की संस्कृति और राजनीति पर लंबी वार्ता हुई, जिस पर अगली कड़ी में चर्चा करेंगे। फिलहाल, इतना कि चौबीस खंभा माता मंदिर के बारे में गूगल पर जानकारी हासिल करने का प्रयास किया तो कुछ ज्यादा जानकारी हासिल नहीं हो सकी। महाराज विक्रमादित्य के काल व श्री महाकाल मंदिर के इतिहास में साम्य को लेकर मतभेद सामने आया, लेकिन एक तथ्य ज्यादातर जगहों पर समान मिला कि मंदिर की दोनों माताएं महामाया व महाल्या हैं। शक्ति स्वरूपा दोनों माताओं को श्री महाकाल वन और नगरी का रक्षक माना जाता है। हम इतिहास और आस्था की तुलना नहीं कर रहे, क्योंकि जब भी ऐसी स्थिति आएगी इतिहास को हारना होगा। जन आस्था के आगे इतिहास कई बार बौना पड़ जाता है। वैसे भी, सनातन संस्कृति व परंपरा इतनी पुरानी और विशाल है कि कागज के पन्नों में उन्हें दर्ज कर पाना कभी भी सहज नहीं हो पाएगा। इसीलिए, हमारे वेद जैसे पुरातन ग्रंथों को श्रुति कहा जाता है। श्रुति यानी श्रव्य यानी सुना हुआ। हमारी परंपरा व आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई आक्रांताओं के बावजूद यह हजारों हजार साल पुरानी श्रुति परंपरा न सिर्फ पूरी आन-बान-शान से जिंदा है, बल्कि पुष्पित-पल्लवित हो रही है... (क्रमशः)

 

रविवार, 18 दिसंबर 2022

एक साध का पूरा होना... श्री महाकाल कृपा बनाए रखें...!

श्री महाकाल दरबार 
कोविड-19 की भीषण आपदा के कारण सामान्य जनजीवन की कई गतिविधियां बंद हो गई थीं। उन्हीं में एक था-पर्यटन। मैं अपनी गिनती उत्कंठ पर्यटकों में नहीं करता, लेकिन घूमने-फिरने, खासकर धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों पर जाने और उनके बारे में जानने से मन को शांति मिलती है। श्री महाकाल के दरबार में सपरिवार शीश नवाने की दिली इच्छा थी। लंबे समय से यह कामना मन में दबी हुई थी। अक्टूबर में प्रभु की प्रेरणा से इच्छी बलवती हुई और इधर-उधर से थोड़ी सी जानकारी हासिल करने के बाद पूरे परिवार का टिकट करवा लिया। मित्र श्री सूर्यनारायण जी की मदद से अन्य व्यवस्थाएं हो गईं।
चार दिसंबर, 2022 को इंदौर एक्सप्रेस से दिल्ली से उज्जैन पहुंचे। शाम में बाबा श्री महाकाल के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐेसे लगा जैसे जीवन धन्य हो गया हो... मन-मस्तिष्क में अपरिमित ऊर्जा का संचार हुआ। पूरा परिवार गदगद था। सूर्यास्त के बाद नवनिर्मित श्री महाकाल लोक में बत्तियां जल उठीं। अभी श्रीमहाकाल लोक के दो अन्य चरणों का निर्माण कार्य चल रहा है, इसलिए प्रवेश करते वक्त उस वैभव का एहसास भी नहीं कर सका, जिसका कुछ ही क्षण बाद साक्षी बनने वाला था। करीब 200 कदम चलने के बाद श्रीमहाकाल लोक के वैभव की पहली झलक दिखाई दी। दरअसल, यही श्रीमहाकाल लोक का मुख्य प्रवेश द्वार था और हमने जिस द्वार के प्रवेश किया था वह धाम का पिछला हिस्सा यानी प्रवेश द्वार संख्या चार था। 
 श्रीमहाकाल लोक में सनातन संस्कृति को सहेजने और उन्हें भव्यता प्रदान करने का बेहतरीन काम हुआ है। यह श्रीमहाकाल लोक का पहला चरण है और उसकी भव्यता मन को छू जाती है। दो और चरणों पर काम तेजी से चल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो चरणों के पूरा होने के बाद श्रीमहाकाल लोक का वैभव अप्रतिम हो जाएगा। माताजी  बुजुर्ग हैं और यात्रा के कारण हम भी थके हुए थे, इसलिए श्रीमहाकाल लोक के प्रथम चरण के अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाए। बीच से ही लौटने के क्रम में भारत माता मंदिर के दर्शन हुए। अगले दिन सुबह करीब 150 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित एक अन्य ज्योतिर्लिंग बाबा ओंकारेश्वर व ममकेश्वर के दर्शन के लिए रवाना होना था, तो हम सभी खाना खाने के बाद जल्दी सो गए। 
(क्रमशः )
श्री महाकाल लोक 


श्री महाकाल परिसर 




श्री महाकाल लोक
 
श्री महाकाल लोक