बुधवार, 28 दिसंबर 2022

श्री ओंकारेश्वर व श्री ममकेश्वर महादेव

श्री ओमकारेश्वर महादेव मंदिर में पंक्तिबद्ध
चौबीस खंभा माता मंदिर चौराहे पर चाय पीने के बाद हम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शुमार श्री ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन के लिए निकल पड़े। आगरा-मुंबई हाईवे से इंदौर तक जाना था, जहां से श्री ओंकारेश्वर के लिए अलग रास्ता निकलता है। हाईवे के किनारे थोड़ी दूरी पर स्थित पहाड़ियों की ओट से सूर्योदय का दृश्य मन मोह रहा था। धान की कटाई हो चुकी थी, तो खेत लगभग खाली थे। कुछ में सब्जियां आदि लगाई गई थीं। कुछ जगहों पर कपास के खेत भी दिखाई दिए। बचपन में हमने अपने इलाके में कपास के कुछ पौधों व छोटे पेड़ों को देखा था, जिनमें फूल कम ही हुआ करते थे और जो होते थे वे थोड़े बड़े होते थे। यह कपास उससे अलग था। पौधे छोटे थे, फूल खूब लगे हुए थे और छोटे-छोटे फलों में रूई तैयार हो रही थी। इंदौर से जब हम श्री ओंकारेश्वर यानी खंडवा जिले की तरफ बढ़े, तब मिर्च की खेती भी दिखाई दी। कई जगहों पर सड़क किनारे लोग लाल मिर्च बेच भी रहे थे। मन तो खूब हुआ रुककर मिर्च के बारे में जानकारी हासिल करने और कुछ खरीदने का, लेकिन अपने मतलब की नहीं थी, इसलिए मस्तिष्क का निर्णय भारी पड़ गया और हम उन ठीहों को निहारते हुए आगे बढ़ते गए। 

रास्ते में भैरव घाटी आई, जिसके मोड़ काफी तीखे थे। जरा सी सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। हमारे सारथी
अभिषेक यादव जी ने बताया कि घाटी के तीखे मोड़ और संकरी सड़क से निजात पाने के लिए बिल्कुल पास से ही सीधी सड़क बनाई जा रही है। हमने देखा भी कि सड़क निर्माण का काम तेजी से चल रहा है। इंदौर की प्यास बुझाने के लिए श्री ओंकारेश्वर से इंदौर तक बड़ी पाइपलाइन डाली गई है, जिससे नर्मदा नदी का पानी मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी तक पहुंचता है। पाइपलाइन लगभग पूरे रास्ते हमारे समानांतर चलती रही। बीच में रेलवे की मीटरगेज लाइन दिखाई दी। वह रेललाइन अब भी प्रचलन में है और यात्री ट्रेनें इंदौर के पास के एक स्टेशन से खंडवा तक जाती हैं।

अभिषेक जी काफी सुलझे हुए इंसान व कामयाब कारोबारी हैं। उनका टूर एंड ट्रैवल का काम तो है ही, साथ ही और भी कई काम करते हैं। राजनीति में भी रूचि रखते हैं, लेकिन अपना पक्ष जहां तक संभव हो जाहिर नहीं होने देते। मध्य प्रदेश की राजनीति पर बात तो होनी ही थी। मैंने छेड़ दिया- मामाजी कैसा कर रहे हैं। अभिषेक जी ने हंसते हुए कहा- अच्छा कर रहे हैं सर। ज्योतिरादित्य सिंधिया को छोड़ दें, तो उन्हें भाजपा में कोई टक्कर नहीं देने वाला। हालांकि, वे कह चुके हैं कि इस बार वे मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे। ...और राहुल जी की यात्रा, जो दो दिनों पहले ही उज्जैन से गुजरी है... मैंने बीच में काटते हुए कहा। अभिषेक जी खुलकर हंसे और कहा, एमपी में तो उनका कुछ नहीं होने वाला। पार्टी भी अच्छी पोजीशन में नहीं है। धड़ों में बंटी हुई है। उत्तर प्रदेश व बिहार में यादवों का राजनीति में अच्छा-खासा हस्तक्षेप है, लेकिन मध्य प्रदेश में कोई बहुचर्चित यादव चेहरा नहीं दिखाई देता, ऐसा क्यों? अभिषेक जी कहते हैं, दिखाई नहीं देता, लेकिन मंत्री तो हैं। आधा दर्जन से ज्यादा विधायक भी हैं। कई सीटों पर यादव निर्णायक स्थित में हैं, लेकिन यूपी-बिहार की तरह शोर नहीं मचाते।
श्री ओंकारेश्वर महादेव मंदिर के भीतर की नक्काशी 

खेती-बाड़ी, आजीविका व रहन-सहन के मुद्दे पर थोड़ी-थोड़ी बातें होती रहीं और रास्ता कटता रहा। करीब 10 बजे हम श्रीओंकारेश्वर पहुंच गए। नर्मदा नदी के दोनों किनारों पर एक समृद्ध गांव जहां भगवान भोलेनाथ की कृपा प्रत्यक्ष दिखाई देती है। श्री ओंकारेश्वर और आसपास की पूरी अर्थव्यवस्था आस्था पर आधारित है। 
अभिषेक जी ने हमें श्री ममकेश्वर मंदिर के पास छोड़ा और गाड़ी से उतरते ही पंडे पीछे पड़ गए। मैंने उन्हें मीठे शब्दों में टालने की कोशिश की, लेकिन वे दर्शन कराने के लिए न्यूनतम दक्षिणा की शर्त पर उतारू हो गए। आखिरकार मुझे कहना ही पड़ा कि भक्त और भगवान के बीच किसी तीसरे का क्या काम। हम खुद दर्शन कर लेंगे और जितने भी शुद्ध-अशुद्ध मंत्र आते हैं, उन्हीं से भगवान की आराधना कर लेंगे। अभिषेक जी ने बता दिया कि सीढि़यों से नीचे उतर जाइए। मोटरयुक्त नौकाएं मिलेंगी, उन्हीं से नर्मदा पार कर लीजिएगा। हमें लगा कि लोटा खरीद लेना चाहिए, जिससे श्री ओंकारेश्वर महादेव को जल चढ़ा लेंगे। तांबे का लोटा खरीदा और एक छोटा सा केन भी, जिसमें पवित्र नर्मदा का जल संग्रहीत करने की इच्छा थी। नाव जब चली तो हमने लोटे में नर्मदा जल भरने का प्रयास किया, लेकिन धारा इतनी तेज थी कि अपने साथ लोटे को भी बहा ले गई। 

खैर, तट पर उतरते ही पूजन सामग्री वाली दुकान से तीन लोटे मुफ्त में मिल गए, जिन्हें जल चढ़ाने के बाद लौटा
देना था।  पूजन सामग्री की दुकान पर फिर एक बार पंडों ने दर्शन और संकल्प करवाने का प्रस्ताव दिया, जिसे हम विनम्रता से खारिज करते रहे। श्री ओंकारेश्वर मंदिर में लाइन लंबी थी, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं। हमें उम्मीद थी कि आधे घंटे में हमारी बारी आ जाएगी। हुआ भी ऐसा ही। जलाभिषेक के लिए करघा लगा हुआ था, लेकिन कम ही लोग उस करघे में जल अर्पित कर रहे थे। सब ने प्रत्यक्ष रूप से श्री ओंकारेश्वर महादेव को जल अर्पित करने का संकल्प ले रखा था। नर्मादा नदी के तट पर स्थित मंदिर बाहर से जितनी भव्यता लिए है, उससे ज्यादा भव्यता अंदर के शिलास्तंभों पर बारीकी से उकेरी गईं कलाकृतियों पर दिखाई देती हैं, जो सहज ही मन मोह लेती हैं। 

गर्भ गृह अमूमन सभी जगह छोटा होता है, यहां भी कुछ ऐसा ही था। कुछ लोगों ने बताया कि पहले भगवान ओंकारेश्वर महादेव को छूने व जल चढ़ाने की इजाजत थी, लेकिन अब वहां शीशे की दीवार खड़ी कर दी गई है। क्षण मात्र दर्शन और चंद बूंदे अरघे में चढ़ाने का मौका मिलता है और पुजारीगण दूसरों को मौका देने की बात कहकर आगे बढ़ा देते हैं। प्रभु के दरबार में चूंकि सबको मत्था टेकने का मौका मिलना चाहिए, इसलिए क्षण मात्र भी अपने हिस्से आना बेहद सौभाग्य की बात है। दर्शन से तृप्त होकर हम बाहर निकले। अभिषेक जी ने बता दिया था कि झूला पुल से आप लौट सकते हैं और श्री ममकेश्वर महादेव के दर्शन के बाद वापस उज्जैन के लिए निकल चलेंगे। 


हम झूला पुल की तरफ बढ़े तो एक महिला को ताजे अमरूद बेचते देखा। थोड़ा चकित रह गया, जब जाना कि उनके पास तीन पाव के बाट थे। उन्होंने किसी प्रकार दो किलो अमरूद तौला। अब समस्या आई कि हमारे पास थैली नहीं थी। खैर, पास के एक दुकानदार ने थैली उपलब्ध करवा दी। श्री ममकेश्वर महादेव के पहले एक दुकान पर प्रसाद खरीदने के बाद अपने सारे सामान वहीं रख दिया। दुकान चलाने वाली महिला ने बताया कि श्री ममकेश्वर व श्री ओंकारेश्वर मिलकर एक ज्योतिर्लिंग बनते हैं। 

श्री ममकेश्वर महादेव के दर्शन के लिए ज्यादा लंबी कतार नहीं थी। लगभग 15 मिनट में हमारा नंबर आ गया।
वहां न सिर्फ शिवलिंग पर जल चढ़ाने का मौका मिला, बल्कि बिलपत्र व अन्य पूजन सामग्री भी तसल्ली से चढ़ा पाया। श्री ओंकारेश्वर व श्री ममकेश्वर महादेव के दिव्य दर्शन व पूजन-अर्चन का आलौकिक आनंद प्राप्त कर हम करीब दो बजे के आसपास फारिग हुए। लौटते वक्त श्री ओंकारेश्वर के पास ही एक लाइन होटल में अभिषेक जी ने गाड़ी रोक दी। बहुत लजीज भोजन मिला, वह भी पूरी सफाई के साथ। उज्जैन से लौटते वक्त नींद सभी लोगों पर हावी होने लगी थी। अभिषेक जी को छोड़कर सभी ने झपकी ली। शाम करीब साढ़े पांच बजे हम उज्जैन लौट आए... (क्रमशः)

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

श्री महाकाल और चौबीस खंभा माता

चार दिसंबर, 2022 को अवंतिकानाथ श्री महाकाल के प्रथम अलौकिक दर्शन और श्री महाकाल लोक की भव्यता देख प्रफुल्लित मन से हम सभी जल्दी सो गए। पांच दिसंबर को सुबह करीब साढ़े चार बजे उठे और जल्दी-जल्दी तैयार होने लगे। पांच बजे फोन मिलाया तो अभिषेक यादव जी भी तैयार हो रहे थे। आधे घंटे उनका फोन आया कि होटल के पास जाम न लग जाए, इसलिए मैंने गाड़ी चौराहे पर पार्क कर दी है। पास में ही मंदिर है, किसी से पूछ लीजिएगा बता देगा। 

चौबीस खंभा माता मंदिर के पास मां, पत्नी व देवांश...

पुरुष सदस्य, यानी मैं और देवांश तैयार हो चुके थे, तो सोचा यात्रा से पहले थोड़ी-थोड़ी चाय पी ली जाए। तैयारियों के बीच उस चौराहे और मंदिर का नाम भूल गया, जिसके बारे में अभिषेक जी ने बताया था। अपने होटल से बाहर निकला, तो एक दुकान पर कुछ लोग खड़े दिखाई दिए। मैंने देवांश को उन लोगों से बारह खंभा माता मंदिर के बारे में पूछने को कहा। बताने वाले भी काफी दिलचस्प थे। उन्होंने उल्टा सवाल दाग दिया, तुम्हें जाना कहां है। बारह खंभा माता मंदिर या चौबीस खंभा माता मंदिर। देवांश दुविधा में दिखाई दिए, तो पीछे से मैंने कहा- कुछ श्योर नहीं हूं। ऐसा कोई मंदिर है, आप ही बता दीजिए... प्लीज।

मेरे बैकफुट पर आता देख उन सज्जन का अंदाज-ए-बयां और दिलचस्प हो गया। अमां यार, बारह खंभे क्यों घटा दिए भाई। उनका खंभा तो मुगलों व अंग्रेजों तक नहीं तोड़ पाए और तुम सीधा बारह खंभा कम कर दिए भाई यार। ये तो ठीक नहीं है भाई यार... इससे पहले कि वह रौ में कुछ और कह पाते, एक अन्य सज्जन ने बीच में ही कहा- आप नीचे उतर जाओ और दाएं मुड़ जाना। वहीं माता का मंदिर है। सुबह की शुरुआत दिलचस्प हुई थी। माता मंदिर के पास पहुंचा तो अभिषेक जी से मुलाकात हुई। हम चौबीस खंभा माता मंदिर के पास ही खड़े थे। मंदिर किसी पुराने किले का द्वार जैसा था, जिसके ऊपर के हिस्से थोड़े क्षतिग्रस्त हो गए थे। बड़ा सा ग्लो साइनबोर्ड लगा हुआ था, जिसके कारण हम सुबह उस क्षतिग्रस्त हिस्से को नहीं देख पाए।

पास में ही एक बुजुर्ग चाय की टपरी लगाए हुए थे। सोचा, जबतक महिलाएं गाड़ी तक पहुंचती हैं, तबतक थोड़ी-थोड़ी चाय पी ली जाए। अमूमन फीकी चाय बनाने में दुकानदार ना-नुकुर करते हैं, लेकिन वे एक कप फीकी चाय बनाने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गए। चाय भी लाजवाब थी। दो कप लगातार पी ली। फ्लास्क भरवा लिया और देवांश की मां भी चाय पीकर खुश हो गईं। वह मुझसे ज्यादा चाय की शौकीन हैं। चाय पीने के क्रम में बुजुर्गवार ने बताया कि चौबीस खंभा माता मंदिर की महिमा का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि महाराज विक्रमादित्य भी महाष्टमी के दिन के भंडारे का प्रसाद खुद पकाते थे। उन्हें बड़ी माता व छोटी माता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। वह परंपरा आज भी कायम है। आज भी जिले के कलेक्टर महाष्टमी के दिन खुद भंडारे का प्रसाद बनाते हैं। शारदीय व चैत्र नवरात्र, दोनों में। पहले यही श्री महाकाल मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार होता था, लेकिन अब इसके पीछे उज्जैन का मुख्य बाजार, यूं कहें मंडी बस गई है।

हमें ओंकारेश्वर व ममकेश्वर महादेव के दर्शन की जल्दी थी। श्री ओंकारेश्वर महादेव द्वादश ज्योतिर्लिंग में शुमार हैं। अभिषेक जी ने बताया कि दोपहर में श्री ओंकारेश्वर महादेव का कपाट एक घंटे के लिए बंद हो जाता है, इसलिए बेहतर होगा कि हम जल्दी वहां पहुंच जाएं। निकलते थोड़ी देर हो गई थी और कुछ दूर तक सड़क भी खराब थी, इसलिए पहुंचने में 10 बज गए। बीच में अभिषेक जी से मध्य प्रदेश की संस्कृति और राजनीति पर लंबी वार्ता हुई, जिस पर अगली कड़ी में चर्चा करेंगे। फिलहाल, इतना कि चौबीस खंभा माता मंदिर के बारे में गूगल पर जानकारी हासिल करने का प्रयास किया तो कुछ ज्यादा जानकारी हासिल नहीं हो सकी। महाराज विक्रमादित्य के काल व श्री महाकाल मंदिर के इतिहास में साम्य को लेकर मतभेद सामने आया, लेकिन एक तथ्य ज्यादातर जगहों पर समान मिला कि मंदिर की दोनों माताएं महामाया व महाल्या हैं। शक्ति स्वरूपा दोनों माताओं को श्री महाकाल वन और नगरी का रक्षक माना जाता है। हम इतिहास और आस्था की तुलना नहीं कर रहे, क्योंकि जब भी ऐसी स्थिति आएगी इतिहास को हारना होगा। जन आस्था के आगे इतिहास कई बार बौना पड़ जाता है। वैसे भी, सनातन संस्कृति व परंपरा इतनी पुरानी और विशाल है कि कागज के पन्नों में उन्हें दर्ज कर पाना कभी भी सहज नहीं हो पाएगा। इसीलिए, हमारे वेद जैसे पुरातन ग्रंथों को श्रुति कहा जाता है। श्रुति यानी श्रव्य यानी सुना हुआ। हमारी परंपरा व आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई आक्रांताओं के बावजूद यह हजारों हजार साल पुरानी श्रुति परंपरा न सिर्फ पूरी आन-बान-शान से जिंदा है, बल्कि पुष्पित-पल्लवित हो रही है... (क्रमशः)

 

रविवार, 18 दिसंबर 2022

एक साध का पूरा होना... श्री महाकाल कृपा बनाए रखें...!

श्री महाकाल दरबार 
कोविड-19 की भीषण आपदा के कारण सामान्य जनजीवन की कई गतिविधियां बंद हो गई थीं। उन्हीं में एक था-पर्यटन। मैं अपनी गिनती उत्कंठ पर्यटकों में नहीं करता, लेकिन घूमने-फिरने, खासकर धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों पर जाने और उनके बारे में जानने से मन को शांति मिलती है। श्री महाकाल के दरबार में सपरिवार शीश नवाने की दिली इच्छा थी। लंबे समय से यह कामना मन में दबी हुई थी। अक्टूबर में प्रभु की प्रेरणा से इच्छी बलवती हुई और इधर-उधर से थोड़ी सी जानकारी हासिल करने के बाद पूरे परिवार का टिकट करवा लिया। मित्र श्री सूर्यनारायण जी की मदद से अन्य व्यवस्थाएं हो गईं।
चार दिसंबर, 2022 को इंदौर एक्सप्रेस से दिल्ली से उज्जैन पहुंचे। शाम में बाबा श्री महाकाल के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐेसे लगा जैसे जीवन धन्य हो गया हो... मन-मस्तिष्क में अपरिमित ऊर्जा का संचार हुआ। पूरा परिवार गदगद था। सूर्यास्त के बाद नवनिर्मित श्री महाकाल लोक में बत्तियां जल उठीं। अभी श्रीमहाकाल लोक के दो अन्य चरणों का निर्माण कार्य चल रहा है, इसलिए प्रवेश करते वक्त उस वैभव का एहसास भी नहीं कर सका, जिसका कुछ ही क्षण बाद साक्षी बनने वाला था। करीब 200 कदम चलने के बाद श्रीमहाकाल लोक के वैभव की पहली झलक दिखाई दी। दरअसल, यही श्रीमहाकाल लोक का मुख्य प्रवेश द्वार था और हमने जिस द्वार के प्रवेश किया था वह धाम का पिछला हिस्सा यानी प्रवेश द्वार संख्या चार था। 
 श्रीमहाकाल लोक में सनातन संस्कृति को सहेजने और उन्हें भव्यता प्रदान करने का बेहतरीन काम हुआ है। यह श्रीमहाकाल लोक का पहला चरण है और उसकी भव्यता मन को छू जाती है। दो और चरणों पर काम तेजी से चल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो चरणों के पूरा होने के बाद श्रीमहाकाल लोक का वैभव अप्रतिम हो जाएगा। माताजी  बुजुर्ग हैं और यात्रा के कारण हम भी थके हुए थे, इसलिए श्रीमहाकाल लोक के प्रथम चरण के अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाए। बीच से ही लौटने के क्रम में भारत माता मंदिर के दर्शन हुए। अगले दिन सुबह करीब 150 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित एक अन्य ज्योतिर्लिंग बाबा ओंकारेश्वर व ममकेश्वर के दर्शन के लिए रवाना होना था, तो हम सभी खाना खाने के बाद जल्दी सो गए। 
(क्रमशः )
श्री महाकाल लोक 


श्री महाकाल परिसर 




श्री महाकाल लोक
 
श्री महाकाल लोक

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

अंकों की दौड़ और जीवन के अनुभव

-कुणाल देव-

सीबीएसई 10वीं व 12वीं के परीक्षा परिणाम आ चुके हैं। बच्चे उत्साहित हैं और उनसे भी ज्यादा खुश हैं उनके माता-पिता व परिजन। यह बहुत स्वभाविक भी है। हम में से ज्यादतर जिस पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां हमारी पीढ़ी तक प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड का ही बोलबाला था। समुद्र जैसा पाठ्यक्रम, स्कूलों में शिक्षकों की घोर कमी और बहुत ही कंजूसी के साथ मूल्यांकन तब प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड की पहचान हुआ करती थी। सारा दोष व्यवस्था पर मढ़ देना अर्धसत्य होगा। हम में से ज्यादतर लोग बेफिक्र भी कुछ ज्यादा ही होते थे। माता-पिता की अपेक्षा भी कुछ ज्यादा नहीं थी। मैट्रिक व इंटर की परीक्षा पास होने को ही बड़ा गौरव मान लेते थे। जिनके बच्चों ने फर्स्ट डिवीजन हासिल कर लिया, वे तो बल्लियों उछल जाते थे। 

मैट्रिक की परीक्षा शिक्षा का पहला फिल्टर होता था। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले किसान परिवार के ज्यादातर बच्चे अर्थाभाववश या स्वभावश किताबों का झोला खूंटी में टांगकर खेतों की तरफ निकल पड़ते थे। इंटरमीडिएट में नाम लिखाने वाले छात्र दो प्रकार के होते थे-एक तो वह जिन्हें वास्तव में पढ़ाई से लगाव था और दूसरा वह जिनके माता-पिता चाहते थे कि बच्चा आगे पढ़ ले। इंटरमीडिएट के दूसरे फिल्टर में दूसरे प्रकार के छात्र छंट जाते थे और खेतों या दुकानों की ओर लौटकर पैतृक विरासत संभालने लगते थे। पहले वाले छात्र थर्ड और सेकेंड डिवीजन के साथ आगे की पढ़ाई जारी रखते थे। कुछ फर्स्ट डिवीजन भी ले आते थे, लेकिन उनकी संख्या नगण्य होती थी। ग्रेजुएशन की पढ़ाई के बाद ज्यादातर छात्र प्रतियोगिता परीक्षाओं में लग जाते थे। यहीं से शुरू हो जाता था क्लर्क से कलक्टर बनने का सफर। जो कलक्टर बन गए वे तो उदाहरण हो ही जाते थे, जो सफल नहीं हो पाए उनकी भी कहानियां कई मौकों पर लोग पूरे जोश के साथ सुनाई जाती थीं।

आज प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड से पढ़ाई करने वालों के बच्चे सीबीएसई व आइसीएसई से संबद्ध स्कूलों से पढ़ाई कर रहे हैं। ये बोर्ड मूल्यांकन में कंजूसी कतई नहीं करते और एक तरह से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा ही देते हैं। बढ़ती आबादी व सीमित होते संसाधनों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जरूरत भी है, वर्ना प्रतिभा के मूल्यांकन का विकल्प ही क्या है। सच कहूं तो आजकल के बच्चे भी हमारी पीढ़ी से ज्यादा प्रतियोगी हो गए हैं और कई बार महसूस होता है कि शिक्षा व करियर की कड़ी प्रतियोगिता ने उन्हें जीवन के व्यावहारिक पहलुओं से थोड़ा जुदा कर दिया है। शहरों, खासकर महानगरों में रह रहे छात्रों की दुनिया कीताबों से शुरू होती है और सोशल मीडिया पर खत्म हो जाती है। राशन की दुकान से लेकर खेत-खलिहान, नदी-नाले व पर्वत-पठार तक के बारे में उनका अनुभव इन्हीं माध्यमों पर आधारित है। इन्हीं अवस्थाओं ने ग्राम्य पर्यटन की संभावनाओं को जन्म दिया है। शायद उसी तरह, जिस तरह पारिवारिक व सामाजिक बिखराव ने वृद्धाश्रम को जन्मा है।

रविवार, 20 जून 2021

तीन चौथाई: तीन चौथाई स्मृति की रेखाएं

तीन चौथाई: तीन चौथाई स्मृति की रेखाएं: ...ताकि कहना न पड़े कि जमाना बदल गया आप सभी आदरणीय जन के आशीर्वाद और प्रिय साथियों की दुआओं का असर है कि दिमाग में जमा अवसाद का लावा अब पि...

रविवार, 14 जून 2020

‘छिछोरे’ ऐसे तो नहीं होते सुशांत

हॉटस्टार पर मुफतिया मूवी की श्रेणी में बार-बार ‘छिछोरे’ हाईलाइट हो रही थी। चिकट फिलिमची हूं। घटिया से घटिया फिल्में देख लेता हूं और उनसे अपने मतबल की चीजें निकाल लेता हूं। लेकिन, ‘छिछोरे’ देखने का लंबे समय तक मन नहीं बना पाया। एक तो शायद पब्लिसिटी कम होने के कारण इसका नाम गौर से सुन नहीं पाया था और दूसरा यह मान बैठा था कि जिस फिल्म का नाम इतना घटिया होगा वह फिल्म कैसी होगी। खैर, हर रोज इस फिल्म का पोस्टर देख-देखकर एक दिन जिज्ञासावश उस पर क्लिक कर दिया। मैं यह जानना चाह रहा था कि जिस फिल्म में सुशांत और श्रद्धा हों, उसे युवा पीढ़ी ने खारिज किन कारणों से कर दिया।
श्रद्धांजलि
      फिल्म शुरू हुई, लेकिन शुरुआत भी उतनी दिलचस्प नहीं थी। फिर भी अब पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। जब फिल्म देखनी शुरू की थी तो रात के तीन बज रहे थे। ऊंघ रहा था, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई नींद आंखों से दूर होती गई। हालांकि, फिल्म आज के दर्शकवर्ग के हिसाब से थोड़ी स्लो थी। तथ्य और कथ्य का प्रस्तुतीकरण भी उतना प्रभावी नहीं था, लेकिन उसका विषय और सुशांत के अभिनय ने मुझे भटकने नहीं दिया। फिर तो अपने कॉलेज के दिनों से लेकर अपने बेटे के स्कूली दिनों को एक साथ जी लिया।
      सूरज की लाली दिखने लगी थी और फिल्म अवसान की ओर बढ़ने लगा था। जब फिल्म खत्म हुई तब मैंने तय किया था कि परीक्षा खत्म होने के बाद अपने बेटे को जरूर दिखाऊंगा। भले ही फिल्म की कई बातें हमारी भारतीय मर्यादा के हिसाब से नहीं थीं, लेकिन इसमें वही सारी चीजें थीं जो आज समाज में होती हैं। इसलिए मेरा मानना था कि जिस किसी का भी बच्चा 12वीं की परीक्षा दे रहा हो या दे चुका हो उसे ‘छिछोरे’ जरूर दिखाना चाहिए।
      भाई सुशांत, यूं तो जाने वाले से शिकायत की कोई परंपरा हमारे यहां नहीं, लेकिन तुम्हारी ‘छिछोरे’ ने मुझे यह अधिकार दे दिया है। प्रिय भाई, आज तुमने जो किया उसके बाद तुम क्या बता सकते हो कि मेरे जैसा रूढि़यों से लड़ने वाला पिता भी अपने बेटे का साथ तुम्हारी ‘छिछोरे’ देखना चाहेगा। कई पो चे में तुम्हारी भूमिका इतनी सहज थी, जैसे सारी घटनाएं आंखों के सामने हो रही हों। धौनी को तुमने पर्दे पर हूबहू उतार दिया। इतने लोग तुम्हें चाहते थे। जिस समाज से तुम आते थे उसके लिए तुम बेहद सफल इंसान थे। फिर तुमने ऐसा क्यों किया। बहुत गहरा जख्म दे गए भाई। तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। खैर, मुझे यकीन है कि तुम अपने अभियन से देवलोक को भी जीत लोगे।
  • कुणाल देव

शुक्रवार, 22 मई 2020

शाख से टूटे हुए पत्तों का कोई सहारा नहीं होता...

-कुणाल देव-

पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मुंबई, दिल्ली या कोलकाता... आज कामगारों की दशा एक जैसी है। भूखे पेट और नंगे पांव सिर पर मोटरी लादकर बाल-बच्चों के साथ पैदल ही गांव-घर लौट रहे कामगारों की व्यथा-कथा पत्थरदिल को भी मोम बना दे रही है। उनके घर लौटने की कहानी बेहद दुख है, लेकिन घर वापसी के बाद की चिंता उससे भी ज्यादा गंभीर। समझना मुश्किल नहीं कि अगर गांव में जीने का अवलंब होता तो ये कामगार हजारों किलोमीटर दूर अपनी रोटी क्यों तलाशते। फिर इन लाखों कामगारों के आने से जहां शहरों की आर्थिक व सामजिक व्यवस्था बदल गई, वहीं इनके न रहने से गांवों की व्यवस्था ने भी नया आकार ले लिया है। मिट्टी को छोड़कर जिस प्रकार कामगारों ने लोहे के कल-कारखानों को रोटी का जरिया बना लिया, उसी प्रकार गांव के बचे-खुचे किसानों ने भी जीव-जंतुओं की बजाय अपने दरवाजे पर मशीनों को खड़ा कर दिया। खुलकर कहें तो ये कामगार जिस जिंदगी और रोटी की उम्मीद में गांव लौट रहे हैं, वहां भी अब इसकी गुंजाइश कम रह गई है। किसानों का दिल बड़ा है। अपनी रोटी बांटना और बेबसों को सहारा देना उनकी परंपरा है। लेकिन, यह भी सच है कि जब खुद का पेट भरा हो तभी दान-पुण्य अच्छा लगता है। भूखे पेट दान करने वाले विरले होते हैं।

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जड़ों की ओर-3
         कामगारों की गांव वापसी का रेला आज दुनिया देख रही है, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि पिछले 30-35 वर्षों में धीरे-धीरे उनके पलायन ने एक समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर ही तोड़ दी थी। कृषक पुत्र हूं। खुद किसानी भी की है। इसलिए, अपना वास्ता भोगे हुए यथार्थ से ही है। हम आदर्शोन्मुख यथार्थ की तो कल्पना भी नहीं कर सकते। बचपन में हमने अपने घर में बड़े-बड़े छह बैल, चार-चार मुर्रा भैसें और देसी गायों को निहारा है। मध्यम श्रेणी के किसान के लिए यह गौसंपदा पर्याप्त थी। खेती-गृहस्थी का काम सालोंभर चलता था। इसलिए, दो लोगों को सालभर का रोजगार भी मिला हुआ था। आठ महीने खेती का मौसम होता था और उन दिनों में रोजना औसतन छह-आठ लोगों की जरूरत होती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो एक मध्यम श्रेणी का किसान पांच-छह लोगों के लिए सालोंभर का रोजगार पैदा करता था। यह बात दूसरी है कि खेती-किसानी में दूसरे कामों की तरह चमक-धमक नहीं थी।
बचपन में हमारे घर के प्रमुख सहायक थे- चंदेव राम। उनसे पहले और भी लोग रहे ही होंगे, लेकिन कुछ खास याद नहीं। हम उन्हें चंदेव चाचा या काका कहते थे। मेरे बाबाजी उन्हें बहुत मानते थे। इसलिए, बड़े पापा और पापा भी उनकी बात नहीं काटते थे। चंदेव चाचा का परिवार रहता भी था हमारे घर के बगल में ही। उनकी पांच संतानें हैं- तीन बेटियां और दो बेटे। नाती-पोता की संख्या के बारे में सही अंदाजा नहीं है। चंदेव चाचा के पास खेत नहीं था। इसलिए आय का कोई दूसरा स्रोत नहीं था। हमारे दूसरे प्रमुख सहयोगी नंदकिशोर काका की भी ऐसी ही स्थिति थी। लेकिन, दोनों ही सहयोगियों को परिवार चलाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। बेटे-बेटियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी बहुत अच्छे से निभाया। चंदेव काका के बड़े बेटे यानी बनौधी भइया प्राइमरी स्कूल के मास्टर बने और हेडमास्टर होकर रिटायर हुए। बेटियां भी अच्छे घरों में ब्याही गईं। नाती-पोता भी योग्य स्थान पर हैं। सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन करीब 30-35 साल पहले वक्त ने करवट बदला।

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       चंदेव चाचा की उम्र बढ़ती जा रही थी और घर की जिम्मेदारियों का बोझ बनौधी भइया संभालने लगे थे। इसलिए, उन्होंने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी। नंदकिशोर काका भी बाद  में रिटायर हो गए। हवा का रुख बदलने लगा था। गांव के कुछ युवक पंजाब भाग गए। कुछ दिनों बाद लौटे तो उनके शरीर पर पॉलिस्टर का चमचमाता कपड़ा, हाथों में ट्रांजिस्टर और बालों में सुगंधित तेल था। गांव के दूसरे मेहनतकश युवकों और लोगों को उनकी तरक्की भा गई। कुछ दिनों बाद जब पंजाब की कमाई खत्म हुई तो गांव के महाजन से ब्याज पर रुपये लेकर वे युवक लौटने लगे। गांव के कुछ और लोग भी उनके साथ हो लिए। काम पंजाब में भी किसानी का ही था, लेकिन मेहनताना के रूप में नकदी मिलती थी। कुछ दूसरी सुविधाएं भी। कुछ लोग तो वहां रुक गए, लेकिन कुछ लौट आए। जो लौट आए उनका गांव में कहां मन लगने वाला था। फिर दिल्ली, मुंबई और गुजरात की ओर निकल गए। औद्योगिक क्रांति का दौर था। उद्योग-धंधे तेजी से पनप रहे थे। इसलिए, इन महानगरों में कामगारों की पूछ थी। गांव में खेतिहर श्रमिकों की कमी की सबसे ज्यादा मार छोटे किसानों पर पड़ी। श्रमिकों की मुश्किलें और कृषि कार्य पर बढ़ती लागत का बोझ न उठा सकने वाले छोटे किसानों ने किसानी से तौबा करते हुए मजदूरी का दामन थाम लिया। बिल्कुल, प्रेमचंद के गोदान के गोबर की तरह।
           खेती घाटे का सौदा तो थी ही, एक समय ऐसा भी आया कि वह बोझ बनने लगी। जिन किसानों के घरों में सदस्यों की संख्या ज्यादा थी, उन्होंने अपनी खेती बचाने के लिए कुछ सदस्यों को फैक्ट्रियों में काम करने के लिए भेज दिया। उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान... लोकोक्ति झूठी साबित होने लगी। लेकिन, अनाज का विकल्प कहां तैयार होने वाला था। पैसे कमाने के बाद भी उससे पेट कहां भरने वाला था। यह बात भारत को उद्योगों के जरिये विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने की कोशिश कर रहे नीति नियामकों को धीरे-धीरे समझ में आने लगी। गांव पर ध्यान दिया जाने लगा। सरकारें उद्योगों से छीनकर किसानों को श्रमिक लौटा नहीं सकती थीं, इसलिए खेती में मशीनों को लगा दिया। ट्रैक्टर ने दरवाजे से बैलों को गायब कर दिया। खेतों की जुताई आसान हो गई। किसानों की समस्या थोड़ी कम हुई। लेकिन, रोपाई, बोआई और कटाई की  समस्या अपनी जगह बनी रही। फिर हारवेस्टर युग आया। कृषि उपकरणों पर छूट और सब्सिडी ने यंत्रों को किसानों के दरवाजे तक पहुंचा दिया और आज किसानी यंत्रजनित हो गई है। यानी, अब किसानी में श्रमिकों की उपयोगिता बेहद कम रह गई है। ऐसे में इतनी संख्या में कामगारों को खेती में समायोजित करना असंभव सा प्रतीत होता है और डर लगता है कि गांवों में कहीं भगदड़ की स्थिति पैदा न हो जाए।

समाप्त

मंगलवार, 19 मई 2020

जिंदगी की तलाश में लगाते रहे मौत से बाजी

-कुणाल देव- 

क दंपती छुटि्टयां बिताने श्रीलंका गया था। इस बीच लॉकडाउन हो गया और उसकी छुट्टी इतनी लंबी होती जा रही है कि होटल का जो कमरा कभी उसके लिए सुकून का खजाना था अब उदासी का डेरा है। होटल के कमरे में पिछले करीब दो महीने से बंद रहने के बाद उसे समुद्र की उनमुक्त लहरों से जलन होने लगी है। घर लौटने व अपने परिजनों से मिलने के लिए वह कुछ भी लुटाने को तैयार है। अब जरा सोचिए कि आपके पास कुछ भी न हो- न खाने के लिए और न दिल बहलाने के लिए तो आप क्या करेंगे। घर-परिवार से हजारों किलोमीटर दूर कमाने और उसे लुटाने के बाद प्रवासी कामगारों के पास जड़ों की ओर लौटने के अलावा क्या विकल्प रह जाता है।

जड़ों की ओर-2


         फेसबुक पर एक वीडियो देख रहा था। एक बेकल महिला लगातार रोए जा रही है। वह अपनी बहन के यहां दिल्ली आई थी। इस बीच लॉकडाउन हो गया। पति व बच्चे सासाराम (बिहार) में थे। इस बीच एक दिन उसे सूचना मिली कि उसके पति अब नहीं रहे। जरा सोचिए उसके दिल पर क्या बीता होगा। झोले में जरूरी सामान उठाकर उस ठिकाने पर चल पड़ी जहां से घर लौटने के लिए संसाधन मिलने की उम्मीद थी। बार-बार रोए जा रही है और लोगों से मिन्नते कर रही है कि किसी प्रकार उसे सासाराम तक पहुंचा दिया जाए, ताकि वह अपने पति का अंतिम दर्शन कर सके। यकीन मानिए, किसी की जिंदगी में इससे बुरा कुछ भी नहीं हो सकता।
            मैं यह नहीं कहता कि प्रवासी कामगार ही सर्वथा सही होते हैं, लेकिन अमूमन बर्दाश्त उन्हें ही करना पड़ता है। चाय देने वाले छोटू से लेकर रिक्शा वाले और सब्जी वाले भइया के साथ होने वाला बर्ताव किसी से छुपा नहीं है। इनमें से हजारों ऐसे हैं, जिनके पास छत नहीं होता। वे हर रात नीले आसमान तले गुजारने को मजबूर होते हैं। कोरोना के इस दौर में तो उनके पास नीले आसमान का भी सहारा नहीं रहा। ऐसे ही लोगों ने पैदल घरों का रुख किया और इसके बाद प्रवासी कामगारों की अकुलाहट तेज हो गई।

           जिस ट्रेन के जरिये प्रवासियों ने घर लौटने के सपना संजोया था, महाराष्ट्र में वही ट्रेन एक दिन उन पर चढ़ गई। अपना रास्ता लिए घरों को लौट रहे इन कामगारों को मुजफ्फरनगर में यमराज रूपी बस झपट्टा मारती हुई अपने साथ ले गई। मध्य प्रदेश में ट्रक पलटता है और कई कामगार अपनी आंखों में घर वापसी का सपना लिए स्वर्ग सिधार जाते हैं। गाजियाबाद के रामलीला मैदान में जुटे हजारों प्रवासियों में कोरोना संक्रमण का लेस मात्र भी भय नहीं दिखता। दरअसल, कोरोना ने इन्हें इतना भयभीत कर दिया है कि इनके दिलोदिमाग से भय जाता रहा। अब बस एक ही सुर है कि मरना भी है तो घर लौटकर।
           व्यक्ति जब असहाय हो जाता है तो वह दो ही लोगों को याद करता है मां और ईश्वर। ईश्वर का ठिकाना तो किसी कामगार को मालूम नहीं, लेकिन मां का ठिकाना तो उनका गांव ही है। इसलिए, वह अपनी इस बेहद पीड़ादायक घड़ी में उस जगह जाना चाहते हैं जहां उनकी मां रहती है। जो उनकी मातृभूमि है।

क्रमशः...

शनिवार, 16 मई 2020

तब दिल्ली दूर थी और अब गांव दूर है भाई!

-कुणाल देव-                                                                                                                  

रात करीब डेढ़ बजे हैं। ऑफिस से लौट रहा हूं। दफ्तर से मेरा घर सिर्फ नौ किलोमीटर दूर है, तब भी लौटने की जल्दी होती है। घर आने के लिए नोएडा सेक्टर-62 अंडरपास से गुजरना पड़ता है। रास्ते में मेरे साथ कामगारों का रेला चल रहा है। उन्हें हजारों किलोमीटर दूर जाना है। जल्दी उन्हें भी है, लेकिन जब मंजिल दूर हो और संसाधन कुछ भी उपलब्ध नहीं तो अपने सामर्थ्य की सीमा तय करनी ही पड़ती है। कामगारों के काफिले में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। जिससे जितना बन पड़ता है बोझ भी उठा रहा है। ये गठरी-मोटरी औरों के लिए कुछ नहीं होंगी, लेकिन कामगारों की जिंदगी भर की कमाई है। कष्ट इनके लिए नया नहीं है। पर्व-त्योहार पर रेलगाड़ियों में धक्के खाकर, खड़े रहकर घर जाने की इन्हें आदत है, लेकिन अबकी जो चोट इनके मन पर लगी है उसे ये जल्दी नहीं भूलने वाले।
जड़ों की ओर-1
            रेले में चार युवक अलग-अलग चलते दिखाई दिए। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। गाड़ी धीमी की और उनसे पूछा कि ट्रेनें तो चल गई हैं आप पैदल कहां जा रहे हैं। जवाब मिला कि इन श्रमिक विशेष ट्रेनों में जगह पाना आसान नहीं। पैदल चलने से ज्यादा मशक्कत करनी पड़ रही है। बातचीत में एक युवक बताता है कि वह जहानाबाद (बिहार) का रहने वाला है और उसके साथ के तीन अन्य वाराणसी के। चारों नोएडा सेक्टर सात में एक फैक्ट्री में काम करते थे। वह फैक्ट्री घरों में लगने वाली कुंडियां बनाती है। जब लॉकडाउन शुरू हुआ था तब फैक्ट्री मालिक ने बहुत भरोसा दिया था। रुकने के लिए कहा था। वेतन देने की बात कही थी। राशन आदि की मदद दी भी थी। लेकिन, जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ता गया, कंपनी के मालिक ने दूरी बनानी शुरू कर दी। इन युवकों को पहले की बचत के बूते दिन काटने पड़े। युवकों ने मालिक से राशन व पैसे खत्म होने की बात कही। पहले तो मालिक टाल-मटोल करता रहा, लेकिन जब इन्होंने दबाव बनाया तो उसने मार्च का वेतन देकर कहा कि काम अभी नहीं शुरू होने वाला है। तुमलोग अपने गांव लौट जाओ। कुछ दिन रुककर इन्होंने ट्रेन आदि से घर लौटने की कोशिश की। इस बीच पैसे खर्च होते गए। सारे पैसे खत्म हो जाते तो घर लौटने का कोई भरोसा भी नहीं बचता। पैदल घर कैसे लौट पाओगे, युवक कहते हैं- गाजियाबाद से गुजर रहे जीटी रोड तक पैदल जाएंगे और फिर ट्रकों का इंतजार करेंगे। भीड़ देखकर तो ट्रक वाले भी नहीं रुकते, इसलिए हम चार लोग अलग-अलग चल रहे हैं। उम्मीद है हमें कोई ट्रकवाला बैठा लेगा और कुछ पैसे लेकर कुछ दूर छोड़ देगा। आगे भी ऐसे ही हम घर तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। जब कोई जुगाड़ नहीं लगेगा तो पैदल ही चल देंगे।
     लॉकडाउन की शुरुआत में जब लोगों ने घर जाने की जल्दी की थी और आनंदविहार बसअड्डे पर भीड़ इकट्ठा हुई थी तो बहुत गुस्सा आया था। लगा था कि जान सांसत में डालकर घर लौटने की इतनी भी क्या जल्दी है। खासकर तब जबकि सरकार उन्हें हर समस्या के समाधान का भरोसा दे रही है। संस्थाएं आगे बढ़कर उनका मदद कर रही हैं। सरकार ने भी फैक्ट्री और कंपनी मालिकों से कामगारों को वेतन व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की अपील की है। सच पूछिए तो तब नहीं लगा था कि जिन कामगारों के खून से दिल्ली-एनसीआर की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं और कंपनियां खड़ी हुई हैं, उनके मालिकों का दिल इतना छोटा निकलेगा कि वे अपने नींव के पत्थरों का भार एक-दो महीने भी नहीं उठा पाएंगे। आज जब दिल्ली-एनसीआर से पलायन का दूसरा दौर शुरू हुआ है तो खुद पर और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं व कंपनियों के मालिकों के प्रति अपनी सोच पर ग्लानि होती है। मुझे समझना चाहिए था कि जो लोग सिर्फ लेना जानते हैं वे कुछ भी मुफ्त में भला क्यों देने लगे। 
    
       घर लौटकर जब माताजी से हमने यह बात साझा की तो वह अचंभित रह गईं। बोलीं-इहां से जहानाबाद तो बाबाधाम से भी दूर होगा। जब मैंने बताया कि बाबाधाम से छह गुना ज्यादा दूर है तो वह हताश हो गईं। मेरे जेहन में बचपन की याद तैयर गई- शायद क्लास छह में पढ़ता था। औरंगाबाद से मेरा गांव आठ किलोमीटर पड़ता है। एक दिन औरंगाबाद से गांव पैदल ही पहुंच गया था। मेरी मां इतना चिंतित हो गई थीं कि कई दिनों तक हल्दी का दूध पिलातीं और सरसों तेल गर्म करके पैरों की मालिश करती थीं। जो हजार  दो हजार किलोमीटर पैदल चलकर घर पहुंच रहे हैं उनके पैरों की हालत क्या होती होगी। फेसबुक और ट्विटर आदि सोशल मीडिया पर मजदूरों के पैरों की तस्वीरें विचिलत कर देती हैं। कुछ लोग इन तस्वीरों पर अविश्वास भी कर रहे हैं। ऐसे लोगों से मैं सिर्फ इतना आग्रह करना चाहता हूं कि एक दिन दोपहर में 10 किलोमीटर पैदल चलकर अपने पैरों की हालत देख लें और फिर सच और झूठ का फैसला खुद ही कर लें।

क्रमश...



गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

बुझ गया किशोर मन में प्रेमरोग जगाने वाला एक चिराग

-कुणाल देव-

हरिहरगंज नामक जिस कस्बे में मेरा बचपन बीता वहां सिनेमा देखना भी एक व्यसन माना जाता था। आम लोगों की तरह पापा भी तब बच्चों को सिनेमा देखने देने के पक्षधर नहीं थे। जब हम थोड़े बड़े हुए तो छिप-छिपाकर सिनेमा देखने की अघोषित छूट मिली। तब सार्वजिनक कार्यक्रमों में प्रोजेक्टर के जरिये पर्दे पर सिनेमा दिखाया जाात था। बाद में वीसीआर और वीसीपी ने उसकी जगह ले ली।
वह दौर ऋषि कपूर का था। तभी मैंने मेरा नाम जोकर देखा था, जिसके जरिये उन्होंने बाल कलाकार के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री ली थी। बॉबी देखकर तो किशोरवय मन पागल सा हो गया था। हालांकि, ये फिल्में हमने दोस्तों के साथ रिलीज के काफी बाद देखी थीं। इसके बाद तो चांदनी, प्रेमरोग, लैला मंजनू, हीना, बोल राधा बोल आदि कई फिल्में धड़ाधड़ देखता चला गया।
उस वक्त समाज के किशोर व युवा को ऋषि कपूर की फिल्में पसंद थीं, उनके गाने पसंद थे। इसके विपरीत अभिभावक ऋषि कपूर को छिछोरा अभिनेता समझते थे। वह मानते थे कि ऋषि कपूर इन फिल्मों के जरिये समाज से परंपरा का लबादा उतार रहे हैं, जिसका उन्हें कोई हक नहीं। धीरे-धीरे समाज बदला, फिल्में बदलीं, कलाकार बदले और जो पुराने थे उनकी भूमिका बदल गई। ऋषि कपूर की रोमांटिक छवि में एक्शन का तड़का लगाते हुए गोविंदा का फिल्मी दुनिया में पदार्पण हो चुका था। ज्यादातर घरों में टीवी आ चुका था और फिल्मों की स्वीकार्यता होने लगी थी।
हमारे चिंटू सहब भी बदल गए थे। वह फिल्मी दुनिया में अजूबा बनने की ओर कदम बढ़ा चुके थे। वह रोमांटिक भूमिका को फना कर अग्निपथ पर निकल पड़े थे। मुल्क, डी डे, 102 नॉट आउट जैसी फिल्मों से उन्होंने हीरोइन के इर्दगिर्द चक्कर लगाने वाले हीरो से अलग गंभीर छवि बना ली थी। उन्होंने साबित किया था कि वह शोमैन राज कपूर की विरासत संभालने में सक्षम हैं।
फिल्म देखते-देखते किरदारों और कलाकारों से एक अनूठा बंधन बंध जाता है। किशोरावस्था से लेकर आजतक ऋषि कपूर की शायद ही कोई ऐसी फिल्म है, जिसे मैं नहीं देख पाया। आज जब नींद से जागते ही उनके महाप्रयाण की खबर सुनी तो लगा कि रात तो अब शुरू हुई है। ऋषि कपूर का जाना वास्तव में हम जैसे कई फिल्मचियों के एक सुंदर सपने के टूटने जैसा है। खासकर तब जबकि एक दिन पहले ही हमने फिल्मी दुनिया में आम आदमी के प्रतिनिधि इरफान को खोया है। दोनों महात्माओं को नमन...