रविवार, 14 जून 2020

‘छिछोरे’ ऐसे तो नहीं होते सुशांत

हॉटस्टार पर मुफतिया मूवी की श्रेणी में बार-बार ‘छिछोरे’ हाईलाइट हो रही थी। चिकट फिलिमची हूं। घटिया से घटिया फिल्में देख लेता हूं और उनसे अपने मतबल की चीजें निकाल लेता हूं। लेकिन, ‘छिछोरे’ देखने का लंबे समय तक मन नहीं बना पाया। एक तो शायद पब्लिसिटी कम होने के कारण इसका नाम गौर से सुन नहीं पाया था और दूसरा यह मान बैठा था कि जिस फिल्म का नाम इतना घटिया होगा वह फिल्म कैसी होगी। खैर, हर रोज इस फिल्म का पोस्टर देख-देखकर एक दिन जिज्ञासावश उस पर क्लिक कर दिया। मैं यह जानना चाह रहा था कि जिस फिल्म में सुशांत और श्रद्धा हों, उसे युवा पीढ़ी ने खारिज किन कारणों से कर दिया।
श्रद्धांजलि
      फिल्म शुरू हुई, लेकिन शुरुआत भी उतनी दिलचस्प नहीं थी। फिर भी अब पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। जब फिल्म देखनी शुरू की थी तो रात के तीन बज रहे थे। ऊंघ रहा था, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई नींद आंखों से दूर होती गई। हालांकि, फिल्म आज के दर्शकवर्ग के हिसाब से थोड़ी स्लो थी। तथ्य और कथ्य का प्रस्तुतीकरण भी उतना प्रभावी नहीं था, लेकिन उसका विषय और सुशांत के अभिनय ने मुझे भटकने नहीं दिया। फिर तो अपने कॉलेज के दिनों से लेकर अपने बेटे के स्कूली दिनों को एक साथ जी लिया।
      सूरज की लाली दिखने लगी थी और फिल्म अवसान की ओर बढ़ने लगा था। जब फिल्म खत्म हुई तब मैंने तय किया था कि परीक्षा खत्म होने के बाद अपने बेटे को जरूर दिखाऊंगा। भले ही फिल्म की कई बातें हमारी भारतीय मर्यादा के हिसाब से नहीं थीं, लेकिन इसमें वही सारी चीजें थीं जो आज समाज में होती हैं। इसलिए मेरा मानना था कि जिस किसी का भी बच्चा 12वीं की परीक्षा दे रहा हो या दे चुका हो उसे ‘छिछोरे’ जरूर दिखाना चाहिए।
      भाई सुशांत, यूं तो जाने वाले से शिकायत की कोई परंपरा हमारे यहां नहीं, लेकिन तुम्हारी ‘छिछोरे’ ने मुझे यह अधिकार दे दिया है। प्रिय भाई, आज तुमने जो किया उसके बाद तुम क्या बता सकते हो कि मेरे जैसा रूढि़यों से लड़ने वाला पिता भी अपने बेटे का साथ तुम्हारी ‘छिछोरे’ देखना चाहेगा। कई पो चे में तुम्हारी भूमिका इतनी सहज थी, जैसे सारी घटनाएं आंखों के सामने हो रही हों। धौनी को तुमने पर्दे पर हूबहू उतार दिया। इतने लोग तुम्हें चाहते थे। जिस समाज से तुम आते थे उसके लिए तुम बेहद सफल इंसान थे। फिर तुमने ऐसा क्यों किया। बहुत गहरा जख्म दे गए भाई। तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। खैर, मुझे यकीन है कि तुम अपने अभियन से देवलोक को भी जीत लोगे।
  • कुणाल देव

शुक्रवार, 22 मई 2020

शाख से टूटे हुए पत्तों का कोई सहारा नहीं होता...

-कुणाल देव-

पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मुंबई, दिल्ली या कोलकाता... आज कामगारों की दशा एक जैसी है। भूखे पेट और नंगे पांव सिर पर मोटरी लादकर बाल-बच्चों के साथ पैदल ही गांव-घर लौट रहे कामगारों की व्यथा-कथा पत्थरदिल को भी मोम बना दे रही है। उनके घर लौटने की कहानी बेहद दुख है, लेकिन घर वापसी के बाद की चिंता उससे भी ज्यादा गंभीर। समझना मुश्किल नहीं कि अगर गांव में जीने का अवलंब होता तो ये कामगार हजारों किलोमीटर दूर अपनी रोटी क्यों तलाशते। फिर इन लाखों कामगारों के आने से जहां शहरों की आर्थिक व सामजिक व्यवस्था बदल गई, वहीं इनके न रहने से गांवों की व्यवस्था ने भी नया आकार ले लिया है। मिट्टी को छोड़कर जिस प्रकार कामगारों ने लोहे के कल-कारखानों को रोटी का जरिया बना लिया, उसी प्रकार गांव के बचे-खुचे किसानों ने भी जीव-जंतुओं की बजाय अपने दरवाजे पर मशीनों को खड़ा कर दिया। खुलकर कहें तो ये कामगार जिस जिंदगी और रोटी की उम्मीद में गांव लौट रहे हैं, वहां भी अब इसकी गुंजाइश कम रह गई है। किसानों का दिल बड़ा है। अपनी रोटी बांटना और बेबसों को सहारा देना उनकी परंपरा है। लेकिन, यह भी सच है कि जब खुद का पेट भरा हो तभी दान-पुण्य अच्छा लगता है। भूखे पेट दान करने वाले विरले होते हैं।

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जड़ों की ओर-3
         कामगारों की गांव वापसी का रेला आज दुनिया देख रही है, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि पिछले 30-35 वर्षों में धीरे-धीरे उनके पलायन ने एक समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर ही तोड़ दी थी। कृषक पुत्र हूं। खुद किसानी भी की है। इसलिए, अपना वास्ता भोगे हुए यथार्थ से ही है। हम आदर्शोन्मुख यथार्थ की तो कल्पना भी नहीं कर सकते। बचपन में हमने अपने घर में बड़े-बड़े छह बैल, चार-चार मुर्रा भैसें और देसी गायों को निहारा है। मध्यम श्रेणी के किसान के लिए यह गौसंपदा पर्याप्त थी। खेती-गृहस्थी का काम सालोंभर चलता था। इसलिए, दो लोगों को सालभर का रोजगार भी मिला हुआ था। आठ महीने खेती का मौसम होता था और उन दिनों में रोजना औसतन छह-आठ लोगों की जरूरत होती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो एक मध्यम श्रेणी का किसान पांच-छह लोगों के लिए सालोंभर का रोजगार पैदा करता था। यह बात दूसरी है कि खेती-किसानी में दूसरे कामों की तरह चमक-धमक नहीं थी।
बचपन में हमारे घर के प्रमुख सहायक थे- चंदेव राम। उनसे पहले और भी लोग रहे ही होंगे, लेकिन कुछ खास याद नहीं। हम उन्हें चंदेव चाचा या काका कहते थे। मेरे बाबाजी उन्हें बहुत मानते थे। इसलिए, बड़े पापा और पापा भी उनकी बात नहीं काटते थे। चंदेव चाचा का परिवार रहता भी था हमारे घर के बगल में ही। उनकी पांच संतानें हैं- तीन बेटियां और दो बेटे। नाती-पोता की संख्या के बारे में सही अंदाजा नहीं है। चंदेव चाचा के पास खेत नहीं था। इसलिए आय का कोई दूसरा स्रोत नहीं था। हमारे दूसरे प्रमुख सहयोगी नंदकिशोर काका की भी ऐसी ही स्थिति थी। लेकिन, दोनों ही सहयोगियों को परिवार चलाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। बेटे-बेटियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी बहुत अच्छे से निभाया। चंदेव काका के बड़े बेटे यानी बनौधी भइया प्राइमरी स्कूल के मास्टर बने और हेडमास्टर होकर रिटायर हुए। बेटियां भी अच्छे घरों में ब्याही गईं। नाती-पोता भी योग्य स्थान पर हैं। सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन करीब 30-35 साल पहले वक्त ने करवट बदला।

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       चंदेव चाचा की उम्र बढ़ती जा रही थी और घर की जिम्मेदारियों का बोझ बनौधी भइया संभालने लगे थे। इसलिए, उन्होंने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी। नंदकिशोर काका भी बाद  में रिटायर हो गए। हवा का रुख बदलने लगा था। गांव के कुछ युवक पंजाब भाग गए। कुछ दिनों बाद लौटे तो उनके शरीर पर पॉलिस्टर का चमचमाता कपड़ा, हाथों में ट्रांजिस्टर और बालों में सुगंधित तेल था। गांव के दूसरे मेहनतकश युवकों और लोगों को उनकी तरक्की भा गई। कुछ दिनों बाद जब पंजाब की कमाई खत्म हुई तो गांव के महाजन से ब्याज पर रुपये लेकर वे युवक लौटने लगे। गांव के कुछ और लोग भी उनके साथ हो लिए। काम पंजाब में भी किसानी का ही था, लेकिन मेहनताना के रूप में नकदी मिलती थी। कुछ दूसरी सुविधाएं भी। कुछ लोग तो वहां रुक गए, लेकिन कुछ लौट आए। जो लौट आए उनका गांव में कहां मन लगने वाला था। फिर दिल्ली, मुंबई और गुजरात की ओर निकल गए। औद्योगिक क्रांति का दौर था। उद्योग-धंधे तेजी से पनप रहे थे। इसलिए, इन महानगरों में कामगारों की पूछ थी। गांव में खेतिहर श्रमिकों की कमी की सबसे ज्यादा मार छोटे किसानों पर पड़ी। श्रमिकों की मुश्किलें और कृषि कार्य पर बढ़ती लागत का बोझ न उठा सकने वाले छोटे किसानों ने किसानी से तौबा करते हुए मजदूरी का दामन थाम लिया। बिल्कुल, प्रेमचंद के गोदान के गोबर की तरह।
           खेती घाटे का सौदा तो थी ही, एक समय ऐसा भी आया कि वह बोझ बनने लगी। जिन किसानों के घरों में सदस्यों की संख्या ज्यादा थी, उन्होंने अपनी खेती बचाने के लिए कुछ सदस्यों को फैक्ट्रियों में काम करने के लिए भेज दिया। उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान... लोकोक्ति झूठी साबित होने लगी। लेकिन, अनाज का विकल्प कहां तैयार होने वाला था। पैसे कमाने के बाद भी उससे पेट कहां भरने वाला था। यह बात भारत को उद्योगों के जरिये विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने की कोशिश कर रहे नीति नियामकों को धीरे-धीरे समझ में आने लगी। गांव पर ध्यान दिया जाने लगा। सरकारें उद्योगों से छीनकर किसानों को श्रमिक लौटा नहीं सकती थीं, इसलिए खेती में मशीनों को लगा दिया। ट्रैक्टर ने दरवाजे से बैलों को गायब कर दिया। खेतों की जुताई आसान हो गई। किसानों की समस्या थोड़ी कम हुई। लेकिन, रोपाई, बोआई और कटाई की  समस्या अपनी जगह बनी रही। फिर हारवेस्टर युग आया। कृषि उपकरणों पर छूट और सब्सिडी ने यंत्रों को किसानों के दरवाजे तक पहुंचा दिया और आज किसानी यंत्रजनित हो गई है। यानी, अब किसानी में श्रमिकों की उपयोगिता बेहद कम रह गई है। ऐसे में इतनी संख्या में कामगारों को खेती में समायोजित करना असंभव सा प्रतीत होता है और डर लगता है कि गांवों में कहीं भगदड़ की स्थिति पैदा न हो जाए।

समाप्त

मंगलवार, 19 मई 2020

जिंदगी की तलाश में लगाते रहे मौत से बाजी

-कुणाल देव- 

क दंपती छुटि्टयां बिताने श्रीलंका गया था। इस बीच लॉकडाउन हो गया और उसकी छुट्टी इतनी लंबी होती जा रही है कि होटल का जो कमरा कभी उसके लिए सुकून का खजाना था अब उदासी का डेरा है। होटल के कमरे में पिछले करीब दो महीने से बंद रहने के बाद उसे समुद्र की उनमुक्त लहरों से जलन होने लगी है। घर लौटने व अपने परिजनों से मिलने के लिए वह कुछ भी लुटाने को तैयार है। अब जरा सोचिए कि आपके पास कुछ भी न हो- न खाने के लिए और न दिल बहलाने के लिए तो आप क्या करेंगे। घर-परिवार से हजारों किलोमीटर दूर कमाने और उसे लुटाने के बाद प्रवासी कामगारों के पास जड़ों की ओर लौटने के अलावा क्या विकल्प रह जाता है।

जड़ों की ओर-2


         फेसबुक पर एक वीडियो देख रहा था। एक बेकल महिला लगातार रोए जा रही है। वह अपनी बहन के यहां दिल्ली आई थी। इस बीच लॉकडाउन हो गया। पति व बच्चे सासाराम (बिहार) में थे। इस बीच एक दिन उसे सूचना मिली कि उसके पति अब नहीं रहे। जरा सोचिए उसके दिल पर क्या बीता होगा। झोले में जरूरी सामान उठाकर उस ठिकाने पर चल पड़ी जहां से घर लौटने के लिए संसाधन मिलने की उम्मीद थी। बार-बार रोए जा रही है और लोगों से मिन्नते कर रही है कि किसी प्रकार उसे सासाराम तक पहुंचा दिया जाए, ताकि वह अपने पति का अंतिम दर्शन कर सके। यकीन मानिए, किसी की जिंदगी में इससे बुरा कुछ भी नहीं हो सकता।
            मैं यह नहीं कहता कि प्रवासी कामगार ही सर्वथा सही होते हैं, लेकिन अमूमन बर्दाश्त उन्हें ही करना पड़ता है। चाय देने वाले छोटू से लेकर रिक्शा वाले और सब्जी वाले भइया के साथ होने वाला बर्ताव किसी से छुपा नहीं है। इनमें से हजारों ऐसे हैं, जिनके पास छत नहीं होता। वे हर रात नीले आसमान तले गुजारने को मजबूर होते हैं। कोरोना के इस दौर में तो उनके पास नीले आसमान का भी सहारा नहीं रहा। ऐसे ही लोगों ने पैदल घरों का रुख किया और इसके बाद प्रवासी कामगारों की अकुलाहट तेज हो गई।

           जिस ट्रेन के जरिये प्रवासियों ने घर लौटने के सपना संजोया था, महाराष्ट्र में वही ट्रेन एक दिन उन पर चढ़ गई। अपना रास्ता लिए घरों को लौट रहे इन कामगारों को मुजफ्फरनगर में यमराज रूपी बस झपट्टा मारती हुई अपने साथ ले गई। मध्य प्रदेश में ट्रक पलटता है और कई कामगार अपनी आंखों में घर वापसी का सपना लिए स्वर्ग सिधार जाते हैं। गाजियाबाद के रामलीला मैदान में जुटे हजारों प्रवासियों में कोरोना संक्रमण का लेस मात्र भी भय नहीं दिखता। दरअसल, कोरोना ने इन्हें इतना भयभीत कर दिया है कि इनके दिलोदिमाग से भय जाता रहा। अब बस एक ही सुर है कि मरना भी है तो घर लौटकर।
           व्यक्ति जब असहाय हो जाता है तो वह दो ही लोगों को याद करता है मां और ईश्वर। ईश्वर का ठिकाना तो किसी कामगार को मालूम नहीं, लेकिन मां का ठिकाना तो उनका गांव ही है। इसलिए, वह अपनी इस बेहद पीड़ादायक घड़ी में उस जगह जाना चाहते हैं जहां उनकी मां रहती है। जो उनकी मातृभूमि है।

क्रमशः...

शनिवार, 16 मई 2020

तब दिल्ली दूर थी और अब गांव दूर है भाई!

-कुणाल देव-                                                                                                                  

रात करीब डेढ़ बजे हैं। ऑफिस से लौट रहा हूं। दफ्तर से मेरा घर सिर्फ नौ किलोमीटर दूर है, तब भी लौटने की जल्दी होती है। घर आने के लिए नोएडा सेक्टर-62 अंडरपास से गुजरना पड़ता है। रास्ते में मेरे साथ कामगारों का रेला चल रहा है। उन्हें हजारों किलोमीटर दूर जाना है। जल्दी उन्हें भी है, लेकिन जब मंजिल दूर हो और संसाधन कुछ भी उपलब्ध नहीं तो अपने सामर्थ्य की सीमा तय करनी ही पड़ती है। कामगारों के काफिले में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। जिससे जितना बन पड़ता है बोझ भी उठा रहा है। ये गठरी-मोटरी औरों के लिए कुछ नहीं होंगी, लेकिन कामगारों की जिंदगी भर की कमाई है। कष्ट इनके लिए नया नहीं है। पर्व-त्योहार पर रेलगाड़ियों में धक्के खाकर, खड़े रहकर घर जाने की इन्हें आदत है, लेकिन अबकी जो चोट इनके मन पर लगी है उसे ये जल्दी नहीं भूलने वाले।
जड़ों की ओर-1
            रेले में चार युवक अलग-अलग चलते दिखाई दिए। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। गाड़ी धीमी की और उनसे पूछा कि ट्रेनें तो चल गई हैं आप पैदल कहां जा रहे हैं। जवाब मिला कि इन श्रमिक विशेष ट्रेनों में जगह पाना आसान नहीं। पैदल चलने से ज्यादा मशक्कत करनी पड़ रही है। बातचीत में एक युवक बताता है कि वह जहानाबाद (बिहार) का रहने वाला है और उसके साथ के तीन अन्य वाराणसी के। चारों नोएडा सेक्टर सात में एक फैक्ट्री में काम करते थे। वह फैक्ट्री घरों में लगने वाली कुंडियां बनाती है। जब लॉकडाउन शुरू हुआ था तब फैक्ट्री मालिक ने बहुत भरोसा दिया था। रुकने के लिए कहा था। वेतन देने की बात कही थी। राशन आदि की मदद दी भी थी। लेकिन, जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ता गया, कंपनी के मालिक ने दूरी बनानी शुरू कर दी। इन युवकों को पहले की बचत के बूते दिन काटने पड़े। युवकों ने मालिक से राशन व पैसे खत्म होने की बात कही। पहले तो मालिक टाल-मटोल करता रहा, लेकिन जब इन्होंने दबाव बनाया तो उसने मार्च का वेतन देकर कहा कि काम अभी नहीं शुरू होने वाला है। तुमलोग अपने गांव लौट जाओ। कुछ दिन रुककर इन्होंने ट्रेन आदि से घर लौटने की कोशिश की। इस बीच पैसे खर्च होते गए। सारे पैसे खत्म हो जाते तो घर लौटने का कोई भरोसा भी नहीं बचता। पैदल घर कैसे लौट पाओगे, युवक कहते हैं- गाजियाबाद से गुजर रहे जीटी रोड तक पैदल जाएंगे और फिर ट्रकों का इंतजार करेंगे। भीड़ देखकर तो ट्रक वाले भी नहीं रुकते, इसलिए हम चार लोग अलग-अलग चल रहे हैं। उम्मीद है हमें कोई ट्रकवाला बैठा लेगा और कुछ पैसे लेकर कुछ दूर छोड़ देगा। आगे भी ऐसे ही हम घर तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। जब कोई जुगाड़ नहीं लगेगा तो पैदल ही चल देंगे।
     लॉकडाउन की शुरुआत में जब लोगों ने घर जाने की जल्दी की थी और आनंदविहार बसअड्डे पर भीड़ इकट्ठा हुई थी तो बहुत गुस्सा आया था। लगा था कि जान सांसत में डालकर घर लौटने की इतनी भी क्या जल्दी है। खासकर तब जबकि सरकार उन्हें हर समस्या के समाधान का भरोसा दे रही है। संस्थाएं आगे बढ़कर उनका मदद कर रही हैं। सरकार ने भी फैक्ट्री और कंपनी मालिकों से कामगारों को वेतन व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की अपील की है। सच पूछिए तो तब नहीं लगा था कि जिन कामगारों के खून से दिल्ली-एनसीआर की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं और कंपनियां खड़ी हुई हैं, उनके मालिकों का दिल इतना छोटा निकलेगा कि वे अपने नींव के पत्थरों का भार एक-दो महीने भी नहीं उठा पाएंगे। आज जब दिल्ली-एनसीआर से पलायन का दूसरा दौर शुरू हुआ है तो खुद पर और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं व कंपनियों के मालिकों के प्रति अपनी सोच पर ग्लानि होती है। मुझे समझना चाहिए था कि जो लोग सिर्फ लेना जानते हैं वे कुछ भी मुफ्त में भला क्यों देने लगे। 
    
       घर लौटकर जब माताजी से हमने यह बात साझा की तो वह अचंभित रह गईं। बोलीं-इहां से जहानाबाद तो बाबाधाम से भी दूर होगा। जब मैंने बताया कि बाबाधाम से छह गुना ज्यादा दूर है तो वह हताश हो गईं। मेरे जेहन में बचपन की याद तैयर गई- शायद क्लास छह में पढ़ता था। औरंगाबाद से मेरा गांव आठ किलोमीटर पड़ता है। एक दिन औरंगाबाद से गांव पैदल ही पहुंच गया था। मेरी मां इतना चिंतित हो गई थीं कि कई दिनों तक हल्दी का दूध पिलातीं और सरसों तेल गर्म करके पैरों की मालिश करती थीं। जो हजार  दो हजार किलोमीटर पैदल चलकर घर पहुंच रहे हैं उनके पैरों की हालत क्या होती होगी। फेसबुक और ट्विटर आदि सोशल मीडिया पर मजदूरों के पैरों की तस्वीरें विचिलत कर देती हैं। कुछ लोग इन तस्वीरों पर अविश्वास भी कर रहे हैं। ऐसे लोगों से मैं सिर्फ इतना आग्रह करना चाहता हूं कि एक दिन दोपहर में 10 किलोमीटर पैदल चलकर अपने पैरों की हालत देख लें और फिर सच और झूठ का फैसला खुद ही कर लें।

क्रमश...



गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

बुझ गया किशोर मन में प्रेमरोग जगाने वाला एक चिराग

-कुणाल देव-

हरिहरगंज नामक जिस कस्बे में मेरा बचपन बीता वहां सिनेमा देखना भी एक व्यसन माना जाता था। आम लोगों की तरह पापा भी तब बच्चों को सिनेमा देखने देने के पक्षधर नहीं थे। जब हम थोड़े बड़े हुए तो छिप-छिपाकर सिनेमा देखने की अघोषित छूट मिली। तब सार्वजिनक कार्यक्रमों में प्रोजेक्टर के जरिये पर्दे पर सिनेमा दिखाया जाात था। बाद में वीसीआर और वीसीपी ने उसकी जगह ले ली।
वह दौर ऋषि कपूर का था। तभी मैंने मेरा नाम जोकर देखा था, जिसके जरिये उन्होंने बाल कलाकार के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री ली थी। बॉबी देखकर तो किशोरवय मन पागल सा हो गया था। हालांकि, ये फिल्में हमने दोस्तों के साथ रिलीज के काफी बाद देखी थीं। इसके बाद तो चांदनी, प्रेमरोग, लैला मंजनू, हीना, बोल राधा बोल आदि कई फिल्में धड़ाधड़ देखता चला गया।
उस वक्त समाज के किशोर व युवा को ऋषि कपूर की फिल्में पसंद थीं, उनके गाने पसंद थे। इसके विपरीत अभिभावक ऋषि कपूर को छिछोरा अभिनेता समझते थे। वह मानते थे कि ऋषि कपूर इन फिल्मों के जरिये समाज से परंपरा का लबादा उतार रहे हैं, जिसका उन्हें कोई हक नहीं। धीरे-धीरे समाज बदला, फिल्में बदलीं, कलाकार बदले और जो पुराने थे उनकी भूमिका बदल गई। ऋषि कपूर की रोमांटिक छवि में एक्शन का तड़का लगाते हुए गोविंदा का फिल्मी दुनिया में पदार्पण हो चुका था। ज्यादातर घरों में टीवी आ चुका था और फिल्मों की स्वीकार्यता होने लगी थी।
हमारे चिंटू सहब भी बदल गए थे। वह फिल्मी दुनिया में अजूबा बनने की ओर कदम बढ़ा चुके थे। वह रोमांटिक भूमिका को फना कर अग्निपथ पर निकल पड़े थे। मुल्क, डी डे, 102 नॉट आउट जैसी फिल्मों से उन्होंने हीरोइन के इर्दगिर्द चक्कर लगाने वाले हीरो से अलग गंभीर छवि बना ली थी। उन्होंने साबित किया था कि वह शोमैन राज कपूर की विरासत संभालने में सक्षम हैं।
फिल्म देखते-देखते किरदारों और कलाकारों से एक अनूठा बंधन बंध जाता है। किशोरावस्था से लेकर आजतक ऋषि कपूर की शायद ही कोई ऐसी फिल्म है, जिसे मैं नहीं देख पाया। आज जब नींद से जागते ही उनके महाप्रयाण की खबर सुनी तो लगा कि रात तो अब शुरू हुई है। ऋषि कपूर का जाना वास्तव में हम जैसे कई फिल्मचियों के एक सुंदर सपने के टूटने जैसा है। खासकर तब जबकि एक दिन पहले ही हमने फिल्मी दुनिया में आम आदमी के प्रतिनिधि इरफान को खोया है। दोनों महात्माओं को नमन...

मंगलवार, 3 मार्च 2020

तीन चौथाई: तीन चौथाई नई राहें

तीन चौथाई: तीन चौथाई नई राहें: काम का सही मूल्यांकन भी है जरूरी -कुणाल देव- कई बार ऐसा होता है कि आपकी मेहनत व प्रतिभा के अनुरूप आपको सफलता नहीं मिल पाती है। इसकी दो ... तीन चौथाई

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

तीन चौथाई: नई राहें

तीन चौथाई: नई राहें: नजरिये में छिपा है सफलता का फलसफा -कुणाल देव- परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला है। हाई स्कूल से लेकर आइआइटी और यूपीएससी की तैयारी करने ... तीन चौथाई

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

सहेजें संबंधों की पूंजी

-कुणाल देव-

केशुब महिंद्रा व आनंद महिंद्रा की कंपनी ‘महिंद्रा एंड महिंद्रा’ को भला कौन नहीं जानता होगा। यह जानना और भी दिलचस्प है कि कंपनी का यह मूल नाम नहीं है। आजादी से पहले शुरू हुई इस कंपनी का मूल नाम ‘महिंद्रा एंड मुहम्मद’ हुआ करता था। जी हां, इस कंपनी की शुरुआत यारी-दोस्ती और संबंधों की एक लंबी और प्रेरक दास्तां है। मुहम्मद का पूरा नाम गुलाम मलिक मुहम्मद था। महिंद्र व मुहम्मद घरानों में दांत काटे की दोस्ती थी। इसी दोस्ती ने वर्ष 1945 में पंजाब के लुधियाना में ‘महिंद्रा व मुहम्मद’ नाम से एक कंपनी को जन्म दिया। तब यह कंपनी स्टील का कारोबार करती थी। काम तेजी से चल निकला। इस बीच देश आजाद हुआ, लेकिन दो टुकड़ों में। देश के इस विभाजन ने ‘महिंद्रा एंड मुहम्मद’ से मुहम्मद को छीन लिया। दरअसल, गुलाम मुहम्मद पाकिस्तन चले गए और वहां के पहले वित्त मंत्री बने। इधर, मुहम्मद के जाने के बाद खाली जगह को महिंद्रा से भर दिया गया। इस प्रकार ‘महिंद्रा एंड महिंद्रा’ के रूप में नई कंपनी का जन्म हुआ।
09  सितंबर 2019 को दैनिक जागरण में प्रकाशित 

सबसे महत्वपूर्ण, बड़ा और जरूरी निवेश

आपके संबंध सबसे महत्वपूर्ण, बड़ा और जरूरी निवेश भी होते हैं। फिल्म दीवार ने यश चोपड़ा और अमिताभ बच्चन को करियर की ऊंचाई पर ला खड़ा किया। वक्त बीतता गया और दोनों ने एक साथ कई फिल्में कीं। एक वक्त ऐसा भी आया, जब अमिताभ के पास इतना काम आ गया था कि 24 घंटे भी कम पड़ने लगे थे। लेकिन, जब एबीसीएल के साथ उनकी सारी पूंजी खत्म हो गई और यहां तक कि उन्हें अपने दोनों बंगले-जलसा व प्रतीक्षा गिरवी रखने पड़े तो एक वक्त ऐसा भी आया कि अमिताभ के पास कोई काम नहीं था। करोड़ों के कर्ज में दबे अमिताभ ने नई शुरुआत करने की ठानी और पूरे भरोसे के साथ एक सुबह काम मांगने यश चोपड़ा के पास पहुंच गए। यहीं अमिताभ को फिल्म मोहब्बतें मिली और एक बार फिर उनके करियर की गाड़ी चल निकली।

कभी खत्म न होने वाली पूंजी

वास्तव में आपके संबंध कभी न खत्म होने वाली पूजी होते हैं। हाल ही में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का निधन हुआ। यह अनायास नहीं था कि विरोधी दलों से लेकर तमाम वर्गों के दिग्गज उनके साथ बिताए व्यक्तिगत पलों को याद कर रहे थे। कॉलेज के दिनों में वह किसी के लिए बड़े भाई बने तो राजनीति में उन्होंने दलगत भावना से ऊपर उठकर काम किया। सामाजिक जीवन में भी वह कभी पीछे नहीं हटे। अपनी पार्टी के लिए तो वह बड़े स्तंभ थे ही। कुल मिलाकर एक लाइन में कहें तो उनके संबंधों की परिधि बहुत बड़ी थी। संबंधों को निभाते हुए उन्होंने कई को आगे बढ़ने में मदद की तो कई ने उनके संबंधों को इज्जत देते हुए उन्हें आगे बढ़ाया।

मनोबल की मजबूती का आधार

आपके संबंध सीधे तौर पर अगर कुछ न भी दें तब भी रोजाना बहुत कुछ दे जाते हैं। आप संबंधों के जितने धनी होंगे आपका मनोबल और आत्मविश्वास उतना ही मजबूत होगा। आपके अंदर यह भरोसा होगा कि अगर कुछ बिगड़ता भी है तो आपके रिश्ते-नाते, दोस्त-यार मिलकर उसे संभाल लेंगे। यह भरोसा आपको दूसरे लोगों से अलग करते हुए काम में कुशलता लाने का रास्ता खोलता है। प्रोफेशनल जीवन में अक्सर लोग एक पड़ाव पर आकर चुनौतियों का सामना करने से बचते हैं। कारण है कि उनके ऊपर जिम्मेदारियां आ जाती हैं और वह हासिल चीजों को खोने से डरने लगते हैं। लेकिन, जब आपको भरोसा होता है कि आपके पीछे आपकी बिगड़ी बनाने वाले कई लोग हैं तो आप चुनौतियों का सामना करने से नहीं डरते।

दिखाते हैं नये रास्ते

संस्कृत में एक कहावत है-सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यं अप्रिय। प्रियं च नानृतं ब्रूयात, एष धर्मः सनातनः।। यानी, सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, सत्य लेकिन अप्रिय नहीं बोलना चाहिए। प्रिय लेकिन असत्य नहीं बोलना चाहिए, यही सनातन धर्म है। प्रोफेशनल लाइफ में यह बहुत ही जरूरी हो जाता है। प्राइवेट ही नहीं, सरकारी नौकरी में भी आपकी वाणी संबंध बनाती है और संबंध तरक्की के द्वार खोलते हैं। प्राइवेट सेक्टर में तो कोई भी कंपनी उन्हीं लोगों को प्राथमिकता देती है जो पहले आजमाए जा चुके हों। ऐसे में आपके व्यक्तिगत संबंध ही इस बात की गारंटी देते हैं कि बंदा काम का है।

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उम्मीदों को न बनने दें बोझ

-कुणाल देव-

जरा सोचिए, दाल में नमक न हो, चाय में चीनी न हो और रसमलाई में रस न हो तो क्या होगा? ऐसे ही दाल में नमक ज्यादा हो, चाय में बेहिसाब चीनी हो और रसमलाई में रस ही रस हो तो क्या होगा? जवाब आप सब जानते हैं- स्वाद खत्म हो जाएगा। जिंदगी भी इन पकवानों की जैसी ही। जब भी कोई तत्व कम या ज्यादा हो जाता है, इसकी रफ्तार गड़बड़ा जाती है। पिछले दिनों कैफे कॉफी डे के मालिक वीजी सिद्धार्थ की आत्महत्या ने न सिर्फ कारपोरेट जगत, बल्कि आम लोगों को भी हिला दिया। यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सिद्धार्थ ने आत्महत्या क्यों की? वह कर्ज में दबा आम किसान नहीं थे। फेल होने से डरने वाले नासमझ छात्र भी नहीं थे। वह तो बड़े अचीवर थे। पिता से मिली पांच लाख की पूंजी को मल्टीनेशनल रेस्तरां चेन में बदल चुके थे। फिर उन्हें किस बात की चिंता थी? किस बात का डर था?
26 अगस्त 2019 को दैनिक जागरण में प्रकाशित

गड़बड़ाने न दें जिंदगी का इंग्रीडेंट्स

दरअसल, सिद्धार्थ ही नहीं कोई भी ऐसा तभी करता है, जब उसकी जिदंगी के पकवान का इंग्रीडेंट्स गड़बड़ा जाता है। इंग्रीडेंट्स का आधारभूत तत्व ‘उम्मीद’ अपना आकार बढ़ाता हुआ संघर्ष, समझ और संयम को निष्क्रिय करने लगता है। वह अपना स्वरूप बदलते हुए धीरे-धीरे अव्यावहारिक लक्ष्य, लालच व नासमझ जिद मं’ तब्दली हो जाता है और व्यक्ति को इसका एहसास भी नहीं होता। इस अवस्था में इंसान सार्वभौमिक सत्य से भी दूर होता चला जाता है। वह यह नहीं समझ पाता कि दिन व रात की तरह सफलता और विफलता भी जिंदगी के अनिवार्य तत्व हैं। ऐसा कभी हो नहीं सकता कि जिंदगी में सिर्फ सफलता मिले और ऐसा भी नहीं हो सकता कि जिंदगी में विफलता ही मिलती रहे। इसिलए, जिंदगी के पकवान के इंग्रीडेंट्स को संतुलित रखने की कोशिश करें। उम्मीद बहुत जरूरी हैं, लेकिन उसे इतना भी महत्व न दें कि वे बोझ बन जाए।

विफलताओं की समीक्षा करें, कोशिश जारी रखें

कल्पना कीजिए, अमिताभ बच्चन अॉल इंडिया रेडियो से रिजेक्ट नहीं किए जाते तो महानायक कैसे बनते? केएफसी के संस्थापक कर्नल हारलैंड सांडर्स को 65 साल की उम्र तक सफलता के लिए इंतजार करना पड़ा। चिकेन बनाने की रेसिपी को स्वीकार किए जाने से पहले उन्हें 1009 होटल मालिकों से ना सुनना पड़ा था। मशहूर उपन्यास सीरीज हैरी पॉर्टर की लेखिका जेके रोलिंग को तो जानते ही होंगे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें दाखिला देने से मना कर दिया और 30 वर्ष की उम्र तक तो उन्हें गर्भपात, शादी व तलाक जैसे कई दर्द से गुजरना पड़ा। लेकिन, इसके बाद एक यात्रा के दौरान ट्रेन लेट हुई और वहीं इंतजार करते हुए हैरी पॉटर का आइडिया उनके दिमाग में आया। 35 साल की उम्र तक वह हैरी पॉटर सीरीज के पांच उपन्यास लिखकर अॉथर अॉफ द इयर का खिताब पा चुकी थीं। कहने का मतलब है कि विफलताओं से कभी मत घबराइए। लगातार मिल रही हैं तब भी। उनकी समीक्षा करते रहिए। क्या पता किस विफलता में सफलता का ऐसा सूत्र छिपा हो कि आप अगले ही दिन करियर के फलक पर हों।

खुद से खुद की तुलना कीजिए, दूसरों से नहीं

झारखंड के जमशेदपुर शहर से आप जरूर वाकिफ होंगे। वहां मुझे 2010 से 2017 तक रहने का अवसर मिला। औद्योगिक शहर होने के कारण वहां जिंदगी की रफ्तार भी बड़े महानगरों की तरह तेज है। लोगों के मन में उम्मीदों और अपेक्षाओं का पहाड़ बहुत जल्द ही खड़ा हो जाता है। पड़ोसी की नई कार देख व्यक्ति खुद को बेवजह छोटा महसूस करने लगता है। अभिभावक उम्मीद करने लगते हैं कि पड़ोसी का बेटा बोर्ड परीक्षा में अगर 90 फीसद नंबर लाता है तो मेरे बेटे को इससे कम कतई नहीं लाना चाहिए। उम्मीदों का बोझ इतना बढ़ जाता कि उसे हासिल करने का दबाव कई बार दम लेकर मानता। बोर्ड परीका के बाद छात्रों की आत्महत्या सिलसिला शुरू हो जाता । हालात विकराल होता देख शहर की कुछ संस्थाओं ने इस दिशा में पहल की। अपनी क्लीनिक के साथ-साथ स्कूलों और संस्थानों में काउंसिलिंग शुरू की और आज शहर में आत्महत्या की घटनाएं बेहद कम हो गई हैं। जीवन के संस्थापक सदस्य व काउंसलर महावीर राम का मानना है कि दूसरों से की गई तुलना या प्रतिस्पर्धा अक्सर आपको दुख पहुंचाती है। उम्मीदें पूरी नहीं होने पर मिलने वाली निराशा कई बार हताशा से भी आगे निकल जाती है और आत्महत्या का कारण बनती है। इसलिए, हमेशा लक्ष्य को पाने की कोशिश करें और खुद से खुद की तुलना करें। खुद को आंके कि कल आप कहां थे और आज कहां हैं। यकीन मानिए, आप पाएंगे कि अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रहे हैं और बेहतर हो रहे हैं।

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बुधवार, 11 दिसंबर 2019

धैर्यपूर्ण कर्मठता से मिलती है कामयाबी

-कुणाल देव-

सोहन लाल द्विवेदी की कविता की आखिरी लाइनें 'कुछ किए बिना ही जय जय कार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती', सही मायने में जीवन, संघर्ष और विजय का फलसफा है। दरअसल, सफलता और विफलता जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू हैं। कोई जरूरी नहीं कि आपका हर प्रयास सफल ही हो, लेकिन यह भी सच है कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। अक्सर आदमी संघर्ष के रास्ते से उस वक्त भटक जाता है, जब वह मंजिल के करीब होता है। इसका प्रमुख कारण है कि वह अपनी कोशिश, सफलता और विफलता की तुलना दूसरों से करने लगता है। आर्थिक मंदी की चर्चा के इस दौर में खुद को खुश रखने, उपयोगी बनाने और निराशा को मात देने के लिए जरूरी है कि आप अपने काम को बेहतर तरीके से करें। जिम्मेदारियां लें और उसे शिद्दत से निभाएं। संभव है आपकी इस विशिष्टता पर कुछ दिनों तक कोई गौर न करे, लेकिन यह तय है कि आपका यह गुण बहुत दिनों तक छिपा भी नहीं रहेगा।
14 अक्टूबर को दैनिक जागरण में प्रकाशित 

सुनो कहानी...

एक व्यक्ति लॉन्ड्री चलाता था। अपने काम के सिलसिले में उसने एक गधा व कुत्ते को पाल रखा था। गधा ग्राहकों के कपड़ों को नदी तक पहुंचाता और ले आता तो कुत्ता घर की रखवाली करता। चूंकि गधा कारोबार का हिस्सा था और ज्यादा काम करता था तो मालिक उसकी चिंता ज्यादा करता था। उसके खानपान पर खास ध्यान देता था। यह बात कुत्ते को बुरी लगती थी। धीरे-धीरे कुत्ते के मन में यह बात बैठ गई कि मालिक उसके साथ भेदभाव करता है। वह अनमना रहने लगा। एक रात लॉन्ड्री मालिक के घर चोर घुस आए। कुत्ते ने चोरों को देखा, लेकिन चुप बैठा रहा। गधे ने कुत्ते को उसकी जिम्मेदारी की याद दिलाते हुए कहा कि उसे भौंकना चाहिए। इस पर कुत्ते ने कहा कि मालिक तुम्हें ज्यादा चाहता है। इसलिए, तुमसे जो कुछ भी हो सकता हो करो। मैं नहीं भौंकता। गधे से नहीं रहा गया। वह जोर से ढेंचू-ढेंचू करने लगा। उसकी आवाज सुनकर मालिक की नींद खुल गई और चोर भाग गए। मालिक ने घर में सब कुछ सही सलामत पाया तो उसने गुस्से में गधे की पिटाई कर दी। कुत्ता बहुत खुश हुआ और कहा- जिसका काम उसी को साजे, दूसरा करे तो डंडा बाजे।

कहानी अभी बाकी है...

लॉन्ड्री मालिक के यहां कई बार चोरी के प्रयास हुए और गधे ने हर बार ढेंचू-ढेंचू करके चोरों को भगा दिया। लेकिन, इनाम की बजाय हर बार उसे पिटाई मिलती और कुत्ता हर बार खुश होकर उसे चिढ़ाता। लॉन्ड्री मालिक ने तो गधे को पागल मानते हुए उसके विकल्प की तलाश भी शुरू कर दी थी। गधे ने तय किया कि अबकी बार चोर आएंगे तो वह शोर कतई नहीं मचाएगा। कुछ दिनों बाद लॉन्ड्री मालिक के घर चोर फिर घुस आए। इस बार कुत्ता मजे लेते हुए गधे को शोर करने के लिए उकसाने लगा, लेकिन वह चुप रहा। चोर काफी देर तक घर में रुके और सामान समेटकर जाने लगे। तब गधे से नहीं रहा गया। अपने मालिक का नुकसान बचाने के लिए उसने ढेंचू-ढेंचू करना शुरू कर दिया। चोर सामान छोड़कर भाग गए। मालिक की नींद खुली और डंडा लेकर गधे की पिटाई के लिए निकला। लेकिन, जब उसकी नजर घर खुले दरवाजे पर पड़ी और वह ठिठक गया। बाहर निकलकर देखा तो पास में ही गठरियां दिखाई दीं, जिसमें उसके घर के सामान थे। मालिक माजरा समझ गया। इस बार पिटाई की बारी कुत्ते की थी। उसने न सिर्फ कुत्ते की पिटाई की, बल्कि उसे भगाकर उसकी जगह पर दूसरे कुत्ते को पाल लिया।

सही समय पर सही काम

गधे की मंशा शुरू से ठीक थी। वह काम भी ठीक कर रहा था, लेकिन बदले में मिल क्या रहा था- डंडे। दरअसल, गधा जो काम कर रहा था, वह उसकी जिम्मेदारी से अलग था। इसलिए, वह काम तो सही कर रहा था, लेकिन उसकी जिम्मेदारी न होने के कारण उसका मालिक ध्यान न देते हुए गलत मतलब निकाल ले रहा था। गधे के पास ऐसा कोई प्रमाण भी नहीं था, जिससे वह अपनी वफादारी और कर्मठता को साबित कर पाता। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि गधा सही काम सही समय पर नहीं कर रहा था, जिससे उसे इनाम के बदले डंडे मिलते रहे। आखिरी दिन चोर आने पर जब गधे ने सही समय पर शोर मचाया, तब उसके पास अपनी वफादारी और कर्मठता साबित करने के लिए प्रमाण थे। इसलिए, उसे और उसके काम को सम्मान मिला।

जो कर सकते हैं, जरूर करें

मेरठ के एक बड़े संस्थान में प्रबंधन के विभागाध्यक्ष डॉ. विनीत कौशिक कहते हैं कि घर, ऑफिस या समाज आप कहीं भी हों खुद को दायरे में न बांधें। जो सही लगता हो और आप जो कर सकते हों जरूर करें। कुछ दिनों तक लोग आपके काम की व्याख्या अलग-अलग तरीके से करेंगे, लेकिन जब उन्हें आपके पोटेंशियल का एहसास होगा वे आपका सम्मान करने लगेंगे। किसी भी काम के तुरंत परिणाम की उम्मीद न करें। कई बार किसी काम में लंबा समय लग जाता है। समय-समय पर खुद का और अपने काम का आकलन करते रहें। जब कभी कोई दुविधा हो तो परिवार, मित्र व विषय के जानकारों से चर्चा करें। मन में शंका की कोई गुंजायश कभी न छोड़ें और बेहतर परिणाम की उम्मीद बनाए रखें।

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