रविवार, 30 दिसंबर 2012

तीन चौथाई: काव्य संसार

तीन चौथाई: काव्य संसार: वे सुनते नहीं या समझ नहीं पाते कुछ सवाल फिर जहन में हैं सरकार को हम चुनते हैं हमीं उनके भाग्य विधाता होते हैं।  सरकार भी यद...

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

तीन चौथाई: देशकाल

तीन चौथाई: देशकाल: देश की जांबाज बेटी दामिनी, माफ करना दामिनी, मौत ने तुम्हें भले ही मात दे दी, लेकिन तुम्हारे संघर्ष ने देश के सवा अरब लोगों के दिलों ...

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

तीन चौथाई: देशकाल

तीन चौथाई: देशकाल: डरो ‘भगवान’, अपने अस्तित्व के लिए डरो! (भाग-3)
हमारी नई पीढ़ी के लोग अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर और सरकारी सेवक तो बन जा रहे हैं, लेकिन समाज में अच्छे इंसानों की संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है। सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को देखने वाले लोगों की संख्या तो बहुत रहती है, लेकिन बहुत देर बाद कोई ऐसा इनसान वहां पहुंचता है जो पीड़ित को हॉस्पिटल ले जाने की पहल करता है। छेड़खानी से मुंह फेरने वाले लोगों की संख्या ज्यादा हो गई है। असत्य के विरोध में आवाज जब-जब दबी है, तब-तब असत्य विभिन्न रूपों में सामने आया है। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और गुंडागर्दी जैसे तत्व तभी विकराल होते जाते हैं, जब सत्य और प्रतिकार की सत्ता पर संशय के बादल मंडराने लगते हैं...

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

तीन चौथाई: देशकाल

तीन चौथाई: देशकाल: डरो ‘भगवान’, अपने अस्तित्व के लिए डरो! (भाग-2)
सांस्कृतिक और सामाजिक संक्रमण के इस दौर में जब आदमी के आंखों पर माया का पर्दा पड़ जात...

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

तीन चौथाई: देशकाल

तीन चौथाई: देशकाल: डरो ‘भगवान’, अपने अस्तित्व के लिए डरो!
पहले एक कहानी सुनिये। एक राजा थे। बहुत प्रतापी। जनता उनसे बहुत प्यार करती थी। राजा का दरबार भी ज...

सोमवार, 19 नवंबर 2012

तीन चौथाई: स्मृति की रेखाएं

तीन चौथाई: स्मृति की रेखाएं: पुराने दिन लौटा दो छठी मइया... कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाये...जल्दी-जल्दी उग हो सूरूज बाबा... के तान सुन दिल व्याकुल हो रहा ह...

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

तीन चौथाई: गुदगुदी

तीन चौथाई: गुदगुदी: महिला महाविद्यालय की शिक्षिका ने एक छात्रा से पूछा- नारी का क्या मतलब होता है?  छात्राः शक्ति।  शिक्षिकाः और पुरुष का? छात्राः सहनशक्ति...

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

तीन चौथाई: देशकाल

तीन चौथाई: देशकाल: शास्त्रीजी की खुदकुशी और व्यवस्था की रक्तपिपासा
अजब झारखंड की गजब कहानी- 5     
....आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिस व्यक्ति ने कोल्हान ही नहीं बल्कि पूरे झारखंड के नेताओं को भेदभाव भुलाकर पृथक झारखंड के लिए एक मंच पर ला खड़ा किया उनकी मृत्यु स्वभाविक नहीं थी। उन्होंने खुदकुशी की। इसके पहले उन्होंने एक सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें लिखा कि वे किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते। उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को एमजीएम मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों को शोध के लिए दान में सौंप दिया जाए। 

दरअसल, प्रदेश की लकवाग्रस्त व्यवस्था का उनके जीवन पर बोझ इतना भारी हो गया था कि वह उस बोझ के साथ अपना भार किसी अन्य पर डालना नहीं चाहते थे।

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

तीन चौथाई: काव्य संसार

तीन चौथाई: काव्य संसार:

युद्ध
दिल और दिमाग के बीच
हमेशा
युद्ध चलता रहता है।
दिल पूछता है
इन अच्छे लोगों के साथ
कभी अच्छा क्यों ...

बुधवार, 26 सितंबर 2012

तीन चौथाई: देशकाल

तीन चौथाई: देशकाल:   अजब झारखंड की गजब कहानी- 4   
    डैम, विस्थापन, पुनर्वास, दिकू, जल, जंगल, जमीन, सीआरपीएफ कैंप, रोजगार, माइंस, क्रशर, प्रदूषण, विकिरण...मुद्दे कई हैं। ग्रामीणों के लिए भी और उनके नुमाइंदों के लिए भी। ग्रामीण इन मुद्दों का हल चाहते हैं और नुमाइंदे इन पर बल।
    ऐसा नहीं कि ये मुद्दे स्थानीय हैं। बल्कि, हकीकत तो यह है कि ये मुद्दे स्थानीय होते हुए भी प्रदेश से लेकर दिल्ली तक की रजानीति के द्वार खोलते हैं। आजादी के बाद इन मुद्दों ने कई लोगों को राज्य से लेकर दिल्ली तक की गद्दी नसीब करा दी लेकिन, कुबेर के आशीर्वाद से इनमें रत्ती भर की कमी नहीं आई। आजादी से पहले भी यहां मुद्दे यही थे और आज पैंसठ साल बाद भी यही हैं...