सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

यादें

आपके नाम जिंदगी कर दी  

इन्तिहा आज इश्क की कर दी,
आप के नाम ज़िन्दगी कर दी,
था अँधेरा गरीब खाने में,
आप ने आ के रोशनी कर दी,
देने वाले ने उन को हुस्न दिया,
और अता मुझ को आशिकी कर दी,
तुम ने जुल्फों को रुख पे बिखरा कर,
शाम रंगीन और भी कर दी

धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा

आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा
इतना मानूस न हो ख़िलवतेग़म से अपनी
तू कभी खुद को भी देखेगा तो ड़र जायेगा
तुम सरेराहेवफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बामेरफ़ाक़त से उतर जायेगा
ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शिश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा
ड़ूबते ड़ूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मै नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का फ़राज़
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा

रिंद जो मुझको समझते हैं  

रिंद जो मुझको समझते हैं उन्हे होश नहीं
मैक़दासाज़ हूं मै मैक़दाबरदोश नहीं
पांव उठ सकते नहीं मंज़िल-ए-जाना के ख़िलाफ़
और अगर होश की पूछो तो मुझे होश नहीं
अब तो तासीर-ए-ग़म-ए-इश्क़ यहां तक पहुंची
के इधर होश अगर है तो उधर होश नहीं
मेहंद-ए-तस्बीह तो सब हैं मगर इदराक कहां
ज़िंदगी ख़ुद ही इबादत है मगर होश नहीं
मिल के इक बार गया है कोई जिस दिन से जिगर
मुझको ये वहम है शायद मेरा था दोष (?) नहीं
ये अलग बात है साक़ी के मुझे होश नहीं
वर्ना मै कुछ भी हूं एहसानफ़रामोश नहीं
जो मुझे देखता है नाम तेरा लेता है
मै तो ख़ामोश हूं हालत मेरी ख़ामोश नहीं
कभी उन मदभरी आँखों से पिया था इक जाम
आज तक होश नहीं होश नहीं होश नहीं


एक दीवाने को 

एक दीवाने को ये आये हैं समझाने कई
पहले मै दीवाना था और अब हैं दीवाने कई
मुझको चुप रहना पड़ा बस आप का मुंह देखकर
वरना महफ़िल में थे मेरे जाने पहचाने कई
एक ही पत्थर लगे है हर इबादतगाह में
गढ़ लिये हैं एक ही बुत के सबने अफ़साने कई
मै वो काशी का मुसलमां हूं के जिसको ऐ नज़ीर
अपने घेरे में लिये रहते हैं बुतख़ाने कई

बज़्म-ए-दुश्मन में बुलाते हो

बज़्म-ए-दुश्मन में बुलाते हो ये क्या करते हो
और फिर आँख चुराते हो ये क्या करते हो
बाद मेरे कोई मुझ सा ना मिलेगा तुम को
ख़ाक में किस को मिलाते हो ये क्या करते हो
छींटे पानी के ना दो नींद भरी आँखों पर
सोते फ़ितने को जगाते हो ये क्या करते हो
हम तो देते नहीं क्या ये भी ज़बरदस्ती है
छीन कर दिल लिये जाते हो ये क्या करते हो
हो ना जाये कहीं दामन का छुड़ाना मुश्किल
मुझ को दीवाना बनाते हो ये क्या करते हो.

खुमारी चढ़ के उतर गई

 
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई – 2
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोः सारी उमर गई- 2
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
रंगीन बहारों की ख्वाहिश रही
हाथ मगर कुत्च आया नही- 2
कहने को अपने थे साथी कई
साथ किसीने निभाया नही – 2
कोई भी हमसफ़र नही
खो गई हर डगर कही
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोह सारी उमर गई – 2
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
लोगों को अक्सर देखा है
घर के लिए रोते हुए – 2
हम तोः मगर बेघर ही रहे
घरवालों के होते हुए – 2
आया अपना नज़र नही – 2
अपनी जहाँ तक नज़र गई
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोः सारी उमर गई- 2
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
पहले तोः हम सुन लेते थे
शोर में भी शेह्नैया- 2
अब तोः हमको लगती है
भीड़ में भी तन्हैया
जीने की हसरत किधर गई – 2
दिल की कली बिखर गई
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोः सारी उमर गई- 2
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई

मिलकर जुदा हुए तो 

मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम,
एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम,
आंसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर,
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम,
जब दूरियों की याद दिलों को जलायेगी,
जिस्मों को चांदनी में भिगोया करेंगे हम,
गर दे गया दगा हमें तूफ़ान भी क़तील’,
साहिल पे कश्तियों को डुबोया करेंगे हम,

तेरे खुशबू मे बसे ख़त मैं  

तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा,
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा,
जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह,
याद थे मुझको जो पैगाम-ऐ-जुबानी की तरह,
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह,
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे,
सालाहा-साल मेरे नाम बराबर लिखे,
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे,
तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
प्यार मे डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ,

राम सिमर राम सिमर


राम सिमर राम सिमर, इहे तेरे काज है,
माया को संग त्याग, प्रभु जू की सरन लाग,
जगत सुख मान मिथ्या, झूठो सब साज है,
सुपने जिउ धन पछान, काहे पर करत मान,
बरु की भीत जैसे, बसुधा को राज है,
नानक जन कहत बात, बिनस जैहै तेरो गात,
छीन छीन कर गयो काल, तैसे जात आज है,

मुझसे मिलने के वो करता था बहाने कितने
 
मुझसे मिलने के वो करता था बहाने कितने,
अब गुजारेगा मेरे साथ ज़माने कितने,
मैं गिरा था तो बहुत लोग रुके थे लेकिन,
सोचता हूँ मुझे आए थे उठाने कितने,
जिस तरह मैंने तुझे अपना बना रखा है,
सोचते होंगे यही बात न जाने कितने,
तुम नया ज़ख्म लगाओ तुम्हे इससे क्या है,
भरने वाले है अभी ज़ख्म पुराने कितने,

हम तो हैं परदेस में

हम तो हैं परदेस में देश में निकला होगा चाँद,
अपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँद,
जिन आंखों में काजल बनकर तैरी काली रात,
उन आंखों में आंसू का इक कतरा होगा चाँद,
रात ने ऐसा पेच लगाया टूटी हाथ से डोर,
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद,
चाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीते,
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद,

वो दिल ही क्या

वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे,
मैं तुझको भूल के जिंदा रहूँ खुदा न करे,
रहेगा साथ तेरा प्यार ज़िंदगी बनकर,
ये और बात मेरी ज़िंदगी वफ़ा न करे,
सुना है उसको मोहब्बत दुआएं देती है,
जो दिल पे चोट तो खाए मगर गिला न करे,
ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई मे,
खुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे

ये हिन्दुस्तान है 


जिसे लोग कहते है हिंदुस्तान है,
यही अपने खावाबो का प्यारा जहान है,
कई मज्हबो का यहा एक निशान है,
ये हिंदुस्तान है, ये हिंदुस्तान है,
हर एक दिल मे मिटटी की खुशबु बसी है,
ख्यालो मे हर एक के मेहँदी रची है,
अंधेरे उजाले मे ये ज़िंदगी है,
मगर प्यार ही प्यार की रोशनी है,
हमारी मोहब्बत का ये आशियाँ है,
ये हिंदुस्तान है, ये हिंदुस्तान है,
अंधेरो मे जो आज भटके हुए है,
हमारे ही भाई है बहके हुए है,
सही रास्ता उनको दिखलायेंगे हम,
लगायेंगे सिने से समझायेंगे हम,
हमारा चलन तो बड़ा मेहरबान है,
ये हिंदुस्तान है, ये हिंदुस्तान है

एक चमेली के मंड़वे तले
 
एक चमेली के मंड़वे तले
मैकदे से ज़रा दूर
उस मोड़पर
दो बदन
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए
प्यार हर्फ़-ए-वफ़ा
प्यार उनका ख़ुदा
प्यार उनकी चिता
दो बदन
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए
ओस में भीगते चांदनी में नहाते हुए
जैसे दो ताज़ा रु ताज़ा दम फूल पिछले पहर
ठंड़ी ठंड़ी सुबुक रौ चमन की हवा सर्फ़-ए-मातम हुई
काली काली लटों से लिपट गर्म रुख़सार पर एक पल के लिये रुक गई
हमने देखा उन्हे
दिन में और रात में
नूर-ओ-ज़ुल्मात में
दो बदन
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए
मस्जिदों के मुनारों ने देखा उन्हे
मंदिरों के किवड़ों ने देखा उन्हे
मैकदे की दरारों ने देख उन्हे
दो बदन
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए
अज़ अज़ल ता अबद
ये बता चाराग़र
तेरी ज़ंबील में
नुस्ख़ा-ए-कीमिया-ए-मोहब्बत भी है
कुछ इलाज-ओ-दावा-ए-उल्फ़त भी है
दो बदन
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए
दो बदन प्यार की आग में जल गए
दो बदन प्यार की आग में जल गए। 

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है


चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है,
बाहज़ारां इज़्तिराब-ओ-सदहज़ारां इश्तियाक,
तुझसे वो पहले पहल दिल का लगाना याद है,
तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा,
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है,
खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़्फ़ातन,
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छिपाना याद है,
जानकर सोता तुझे वो क़सा-ए-पाबोसी मेरा,
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है,
तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़राह-ए-लिहाज़,
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है,
जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना ना था,
सच कहो क्या तुम को भी वो कारखाना याद है,
ग़ैर की नज़रों से बचकर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़,
वो तेरा चोरीछिपे रातों को आना याद है,
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़,
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है,
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये,
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है,
देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से,
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है,
चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह,
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है,
बेरुख़ी के साथ सुनाना दर्द-ए-दिल की दास्तां,
और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना याद है,
वक़्त-ए-रुख़सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये,
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है,
बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्तक़ा हसरतमुझे,
आज तक अहद-ए-हवस का ये फ़साना याद है। 

आप को देख कर देखता रह गया
 
आप को देख कर देखता रह गया,
क्या कहुँ और कहने को क्या रह गया,
आते आते मेरा नाम सा रह गया,
उसके होठों पे कुछ कांपता रह गया,
वो मेरे सामने ही गया और मैं,
रास्ते की त्तरह देखता रह गया,
झूठ वाले कहीं से कहीं बढ गये,
और मैं था के सच बोलता रह गया,
आंधियों के इरादे तो अच्छे ना थे,
ये दिया कैसे जलता रह गया,

मैं नशे मे हूं

ठुकराओ अब के प्यार करो, मैं नशे मे हूं,
जो चाहे मेरे यार करो, मैं नशे मे हूं,
अभी दिला रहा हुँ यकीन-ए-वफ़ा मगर,
मेरा ना एतबार करो, मैं नशे मे हूं,
गिरने दो तुम मुझे मेरा सागर सम्भाल लो,
इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे मे हूं,
मुझको कदम कदम पे भटकने दो आज दोस्त,
तुम अपना करोबार करो, मैं नशे मे हूं,
फ़िर बेखुदी में हद से गुजर ने लगा हूं मैं,
इतना ना मुझ से प्यार करो ,मैं नशे मे हूं

चराग-ए-इश्क, जलाने की रात आयी है

चराग-ए-इश्क, जलाने की रात आयी है,
किसी को अपना बनाने की रात आयी है,
वो आज आये है महफ़िल में चांदनी लेकर,
के रोशनी में नहाने की रात आयी है,
फ़लक का चांद भी शर्मा के मुँह छुपायेगा,
नकाब रुख से उठा ने की रात आयी है,
निगाहें साकी से पेहम के छलक रही है शराब,
पियो के पीने पीलाने की रात आयी है

तुझे ढ़ूंढ़ता था मैं 

तुझे ढ़ूंढ़ता था मैं चारसूं तेरी शान जल्लेजलाल हूं,
तू मिला क़रीब-ए-रग-ए-गुलूं तेरी शान जल्लेजलाल हूं,
तेरी याद में है कली कली है चमन चमन में हुबल अली,
तू बसा है फूल में हू-ब-हू तेरी शान जल्लेजलाल हूं,
तेरे हुक्म से जो हवा चली तो चटक के बोली कली कली,
है करीम तू रहीम तू तेरी शान जल्लेजलाल हूं,
तेरा जलवा दोनों जहां में है तेरा नूर कोनोमकां में है,
यहां तू ही तू वहां तू ही तू तेरी शान जल्लेजलाल हूं,

दुनिया से दिल लगाकर

दुनिया से दिल लगाकर दुनिया से क्या मिलेगा,
याद-ए-ख़ुदा किये जा तुझ को ख़ुदा मिलेगा,
दौलत हो या हुकूमत ताक़त हो या जवानी,
हर चीज़ मिटनेवाली हर चीज़ आनी-जानी,
ये सब ग़ुरूर इक दिन मिट्टी में जा मिलेगा,
आता नहीं पलटकर गुज़रा हुआ ज़माना,
क्या ख़्वाब का भरोसा क्या मौत का ठिकाना,
ये ज़िंदगी गंवाकर क्या फ़ायदा मिलेगा


किसका चेहरा अब मैं देखूं
चाँद भी देखा फूल भी देखा
बादल बिजली तितली जुगनूं कोई नहीं है ऐसा
तेरा हुस्न है जैसा
मेरी निगाहों ने ये कैसा ख्वाब देखा है
ज़मीं पे चलता हुआ माहताब देखा है
मेरी आँखों ने चुना है तुझको दुनिया देखकर
किसका चेहरा अब मैं देखूं तेरा चेहरा देखकर
नींद भी देखी ख्वाब भी देखा
चूड़ी बिंदिया दर्पण खुश्बू कोई नहीं है ऐसा
तेरा प्यार है जैसा
रंग भी देखा रूप भी देखा
रस्ता मंज़िल साहिल महफ़िल कोई नहीं है ऐसा
तेरा साथ है जैसा
बहुत खूबसूरत हैं आँखें तुम्हारी
बना दीजिए इनको किस्मत हमारी
उसे और क्या चाहिये ज़िंदगी में
जिसे मिल गई है मुहब्बत तुम्हारी

कभी यूँ भी तो हो

कभी यूँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें
कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से
कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो दिल हो
बूँदें हो बरसात हो
और तुम आओ

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह
बढाके प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

किसे ख़बर थी बढेगी कुछ और तारीकी 
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह
कभी न सोचा था हमने "क़तील" उस के लिये
करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह

पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम
 

पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसां पाए हैं
तुम शहरे मुहब्बत कहते हो, हम जान बचाकर आए हैं ।।
बुतख़ाना समझते हो जिसको पूछो ना वहाँ क्या हालत है
हम लोग वहीं से गुज़रे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं ।।
हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ
सहरा में खु़शी के फूल नहीं, शहरों में ग़मों के साए हैं ।।
होठों पे तबस्सुम हल्का-सा आंखों में नमी से है 'फाकिर'
हम अहले-मुहब्बत पर अकसर ऐसे भी ज़माने आए हैं ।।


एक पुराना मौसम लौटा


एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी
दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी
ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है
उन की बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे,कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे,अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे
हँसो आज इतना कि इस शोर में,सदा सिसकियों की सुनाई न दे
अभी तो बदन में लहू है बहुत,कलम छीन ले रोशनाई न दे
मुझे अपनी चादर से यूँ ढाँप लो,ज़मीं आसमाँ कुछ दिखाई न दे
ग़ुलामी को बरकत समझने लगें,असीरों को ऐसी रिहाई न दे
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए ,जहाँ से मदीना दिखाई न दे
मैं अश्कों से नाम-ए-मुहम्मद लिखूँ,क़लम छीन ले रोशनाई न दे
ख़ुदा ऐसे इरफ़ान का नाम है,रहे सामने और दिखाई न दे


उस मोड़ से शुरू करें

उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
हर शय जहाँ हसीन थी, हम तुम थे अजनबी
लेकर चले थे हम जिन्हें जन्नत के ख़्वाब थे
फूलों के ख़्वाब थे वो मुहब्बत के ख़्वाब थे
लेकिन कहाँ है उन में वो पहली सी दिलकशी
रहते थे हम हसीन ख़यालों की भीड़ में
उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में
आने लगी है याद वो फ़ुर्सत की हर घड़ी
शायद ये वक़्त हमसे कोई चाल चल गया
रिश्ता वफ़ा का और ही रंगो में ढल गया
अश्कों की चाँदनी से थी बेहतर वो धूप ही

मेरे दुख की कोई दवा न करो

मेरे दुख की कोई दवा न करो,मुझ को मुझ से अभी जुदा न करो
नाख़ुदा को ख़ुदा कहा है तो फिर,डूब जाओ, ख़ुदा ख़ुदा न करो
ये सिखाया है दोस्ती ने हमें,दोस्त बनकर कभी वफ़ा न करो
इश्क़ है इश्क़, ये मज़ाक नहीं ,चंद लम्हों में फ़ैसला न करो
आशिक़ी हो या बंदगी 'फ़ाकिर' बे-दिली से तो इबतिदा न करो

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं, जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं
ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहनेवाले, जीनेवाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं
फ़ासले उम्र के कुछ और बढा़ देती है,जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं
चंद मासूम से पत्तों का लहू है "फ़ाकिर", जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते

होंठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो

होंठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो
न उमर की सीमा हो, न जनम का हो बंधन
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन
नई रीत चलाकर तुम, ये रीत अमर कर दो
जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किये मुझसे, मैं हर दम ही हारा
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो
आकाश का सूनापन, मेरे तनहा मन में
पायल छनकाती तुम, आ जाओ जीवन में
साँसें देकर अपनी, संगीत अमर कर दो

क्यूँ ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए

क्यूँ ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए
ऐसा नहीं कि हमको कोई भी खुशी नहीं
लेकिन ये ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं
क्यों इसके फ़ैसले हमें मंज़ूर हो गए
पाया तुम्हें तो हमको लगा तुमको खो दिया
हम दिल पे रोए और ये दिल हम पे रो दिया
पलकों से ख़्वाब क्यों गिरे क्यों चूर हो गए

जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया

जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया
उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया
सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझ को एक कश्ती बादबानी दे गया
ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उस ने इतना तो किया
मेरी पलकों की कतारों को वो पानी दे गया

प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी

प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालात की आंधी में बिखर जाओगी
रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ
ये तो बस मैं हूँ के इस हाल में भी ज़िन्दा हूँ
ख़्वाब क्यूँ देखूँ वो कल जिसपे मैं शर्मिन्दा हूँ
मैं जो शर्मिन्दा हुआ तुम भी तो शरमाओगी
क्यूं मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुमको तो आसान रहे
हमसफ़र मुझको बनाओगी तो पछताओगी
एक मैं क्या अभी आयेंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी

ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर

ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर
तो पहले आके माँग ले, मेरी नज़र तेरी नज़र
ये घर बहुत हसीन है
न बादलों की छाँव में, न चाँदनी के गाँव में
न फूल जैसे रास्ते, बने हैं इसके वास्ते
मगर ये घर अजीब है, ज़मीन के क़रीब है
ये ईँट पत्थरों का घर, हमारी हसरतों का घर
जो चाँदनी नहीं तो क्या, ये रोशनी है प्यार की
दिलों के फूल खिल गये, तो फ़िक्र क्या बहार की
हमारे घर ना आयेगी, कभी ख़ुशी उधार की
हमारी राहतों का घर, हमारी चाहतों का घर
यहाँ महक वफ़ाओं की है, क़हक़हों के रंग है
ये घर तुम्हारा ख़्वाब है, ये घर मेरी उमंग है
न आरज़ू पे क़ैद है, न हौसले पर जंग है
हमारे हौसले का घर, हमारी हिम्मतों का घर

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है,  हँसती आँखों में भी नमी-सी है
दिन भी चुप चाप सर झुकाये था,रात की नब्ज़ भी थमी-सी है
किसको समझायें किसकी बात नहीं, ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है
ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई, गर्द इन पलकों पे जमी-सी है
कह गए हम ये किससे दिल की बात,शहर में एक सनसनी-सी है
हसरतें राख हो गईं लेकिन ,आग अब भी कहीं दबी-सी है

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ायें

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ायें
ना तुम याद आओ ना हम याद आयें
सभी ने लगाया है चेहरे पे चेहरा
किसे याद रखें किसे भूल जायें
उन्हें क्या ख़बर हो आनेवाला ना आया
बरसती रहीं रात भर ये घटायें

आज मैंने अपना फिर सौदा किया

आज मैंने अपना फिर सौदा किया और फिर मैं दूर से देखा किया
जिन्दगी भर मेरे काम आए असूल एक एक करके मैं उन्हें बेचा किया
कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी तुम से क्याद कहते कि तुमने क्या किया
हो गई थी दिल को कुछ उम्मीीद सी खैर तुमने जो किया अच्छाय किया

एक ब्रहामण ने कहा है

एक ब्रहामण ने कहा है कि ये साल अच्छा है
जुल्म की रात बहुत जल्दी ढलेगी अब तो
आग चूल्हे में हर एक रोज जलेगी अब तो
भूख के मारे कोई बच्चा नही रोयेगा
चैन की नींद हर एक शख्स यहाँ सोयेगा
आंधी नफरत की चलेगी ना कहीं अब के बरस
प्यार की फस्ल उगायेगी जमीं अब के बरस
है यकीन अब ना कोई शोर शराबा होगा
जुल्म होगा ना कहीं खून खराबा होगा
ओस और धूप के सदमे ना सहेगा कोई
अब मेरे देश में बेघर ना रहेगा कोई
नये वादों का जो डाला है, वो जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है

मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा

मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा
दीवारों से टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा
हर बात गवारा कर लोगे मन्नत भी उतारा कर लोगे
ताबीज़ें भी बँधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा
तनहाई के झूले झूलोगे हर बात पुरानी भूलोगे
आईने से तुम घबराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा
जब सूरज भी खो जायेगा और चाँद कहीं सो जायेगा
तुम भी घर देर से आओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा
बेचैनी जब बढ जायेगी और याद किसी की आयेगी
तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा


झुकी-झुकी सी नज़र बेकरार है के नहीं

झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है के नहीं
तू अपने दिल की जवाँ धडकनों को गिन के बता
मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है के नहीं
वो पल के जिस में मोहब्बत जवाँ होती है
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है के नहीं
तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है के नहीं

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या गम है जिसको छुपा रहे हो
आंखो में नमी हँसी लबों पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो
बन जायेंगे ज़हर पीते पीते
ये अश्क जो पीते रहे हो
जिन ज़ख्मों को वक्त भर चला है
तुम क्यूं उन्हें छेड़े जा रहे हो
रेखाओं का खेल है मुक्क़द्दर
रेखाओं से मात खा रहे हो

रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है

रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है
पहचान जिस से नहीं थी कभी
अपना बना है वही अजनबी
रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है
तुम्हें देखते ही रहूं मैं
मेरे सामने यूं ही बैठे रहो तुम
करूं दिल की बातें मैं खामोशियों से
और अपने लबों से ना कुछ भी कहो तुम
ये रिश्ता है कैसा ये नाता है कैसा
तेरे तन की ख़ुशबू भी लगती है अपनी
ये कैसी लगन है ये कैसा मिलन है
तेरे दिल की धड़कन भी लगती है अपनी
तुम्हें पा के महसूस होता है ऐसे
के जैसे कभी हम जुदा ही नहीं थे
ये माना के जिस्मों के घर तो नये हैं
मगर हैं पुराने ये बंधन दिलों के

फिर आज मुझे तुमको

फिर आज मुझे तुमको बस इतना बताना है
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है
मधुबन हो या गुलशन हो पतझड़ हो या सावन हो
हर हाल में इन्सां का इक फूल सा जीवन हो
काँटों में उलझ के भी खुशबू ही लुटाना है
हँसना ही जीवन है हंसते ही जाना है
हर पल जो गुज़र जाये दामन को तो भर जाये
ये सोच के जी लें तो तक़दीर संवर जाये
इस उम्र की राहों से खुशियों को चुराना है
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है
सब दर्द मिटा दें हम हर ग़म को सज़ा दें हम
कहते हैं जिसे जीना दुनिया को सिखा दें हम
ये आज तो अपना है कल भी अपनाना है
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है

ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो

ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी
मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी
कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना
वो झूलों से गिरना वो गिर के सँभलना
वो पीतल के छल्लों के प्यारे-से तोहफ़े
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी
कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनानाबना के मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों का बंधन
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी

हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए है

हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए है
जिंदा तो है जीने की अदा भूल गए है
हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए है
खुशबु जो लुटाती है मसलती है उसी को
एहसान का बदला यही मिलता है कली को
एहसान तो लेते है सिला भूल गए है
करते है मोहब्बत का और एहसान का सौदा
मतलब के लिए करते है इमान का सौदा
डर मौत का और खौफ-ऐ-खुदा भूल गए है
अब मोम पिघल कर कोई पत्थर नहीं होता
अब कोई भी कुर्बान किसी पर नहीं होता
यू भटकते है मंजिल का पता भूल गए है

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का ख़िलौना है

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का ख़िलौना है
मिल जाये तो मिट्टी हैं खो जाये तो सोना है
अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम
हर वक़्त का ये रोना तो बेकार का रोना है
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना हैं किस छत को भिगोना है
ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी है
फिर रास्ता ही रास्ता है हंसना है ना रोना है

तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं

तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं
ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं
गाहे-गाहे इसे पढा कीजे
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं
जाने किस किस की मौत आयी है
आज रुख़ पर कोई नक़ाब नहीं
वो करम उन्गलियों पे गिरते हैं
ज़ुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं

कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबाँ होती है

कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबाँ होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है
वो ना आये तो सताती है एक ख़लिश दिल को
वो जो आये तो ख़लिश और जवाँ होती है
रूह को शाद करे दिल को पुर-नूर करे
हर नज़ारे में ये तनवीर कहाँ होती है
ज़ब्त-ए-सैलाब-ए-मुहब्बत को कहाँ तक रोके
दिल में जो बात हो आखों से बयाँ होती है
ज़िन्दगी एक सुलगती सी चिता है साहिर
शोला बनती है ना ये बुझ के धुआँ होती है

इश्क में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने ना दिया

इश्क में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने ना दिया
वरना क्या बात थी किस बात ने रोने ना दिया
आप कहते थे के रोने से ना बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने ना दिया
रोने वालों से कह दो उनका भी रोना रो लें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने ना दिया
तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तन्गी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने ना दिया
यार ने मुझको मुझे यार ने सोने ना दिया
यार ने मुझको मुझे यार ने सोने ना दिया
रात भर ताल-ए-बेदार ने सोने ना दिया
एक शब बुलबुल-ए-बेताब के जागे ना नसीब
पहलू-ए-गुल में कभी ख़ार ने सोने ना दिया
रात भर की दिल-ए-बेताब ने बातें मुझसे
मुझको इस इश्क के बीमार ने सोने ना दिया

वो नहीं मिलता मुझे इसका गिला अपनी जगह

वो नहीं मिलता मुझे इसका गिला अपनी जगह
उसके मेरे दरमियाँ फासिला अपनी जगह
ज़िन्दगी के इस सफ़र में सैकड़ों चेहरे मिले
दिल-कशी उनकी अलग पैकर तेरा अपनी जगह
तुझसे मिल कर आने वाले कल से नफ़रत मोल ली
अब कभी तुझसे ना बिछरूँ ये दुआ अपनी जगह
इस मुसलसल दौड में है मन्ज़िलें और फासिले
पाँव तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह

मेरी तन्हाइयों तुम ही लगा लो मुझको सीने से

मेरी तन्हाईयों तुम ही लगा लो मुझको सीने से
कि मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो रो के जीने से
ये आधी रात को फिर चूड़ियों सा क्या खनकता है
कोई आता है या मेरी ही ज़न्जीरें खनकती हैं
ये बातें किस तरह पूछूँ मैं सावन के महीने से
मुझे पीने दो अपने ही लहू का जाम पीने दो
ना सीने दो किसी को भी मेरा दामन ना सीने दो
मेरी वहशत ना बढ जाये कहीं दामन के सीने से

जाना है जाना है चलते ही जाना है

जाना है जाना है चलते ही जाना है
ना कोई अपना है ना ही ठिकाना है
सब रास्ते नाराज़ हैं
मन्ज़िल की आहटों से राही बेगाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है
क्या कभी साहिल भी तूफ़ान में बहते हैं
सब यहाँ आसान है हौसले कहते हैं
शोलों पे कांटों पे हँस के चल सकते हैं
अपनी तक्दीरों को हम बदल सकते हैं
बिगडे हालातों में दिल को समझाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है
ख्वाबों की दुनिया में यादों के रेले में
आदमी तन्हा है भीड में मेले में
ज़िन्दगी में ऐसा मोड भी आता है
पाँव रुक जाते हैं वक़्त थम जाता है
ऐसे में तो मुश्किल आगे बढ पाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है

क्या बताएं के जाँ गई कैसे

क्या बताएं के जाँ गई कैसे
फिर से दोहराएं वो घड़ी कैसे
क्या बताएं के जाँ गई कैसे
किसने रास्ते मे चाँद रखा था
मुझको ठोकर लगी कैसे
क्या बताएं के जाँ गई कैसे
वक़्त पे पाँव कब रखा हमने
ज़िदगी मुह के बल गिरी कैसे
क्या बताएं के जाँ गई कैसे
आँख तो भर आई थी पानी से
तेरी तस्वीर जल गयी कैसे
क्या बताएं के जाँ गई कैसे
हम तो अब याद भी नहीं करते
आप को हिचकी लग गई कैसे
क्या बताएं के जाँ गई कैसे

तेरी सूरत जो भरी रहती है आँखों में सदा

तेरी सूरत जो भरी रहती है आँखों में सदा
अजनबी चेहरे भी पहचाने से लगते हैं मुझे
तेरे रिश्तों में तो दुनियाँ ही पिरो ली मैंने
एक से घर हैं सभी एक से हैं बाशिन्दे
अजनबी शहर मैं कुछ अजनबी लगता ही नहीं
एक से दर्द हैं सब एक से ही रिश्ते हैं
उम्र के खेल में इक तरफ़ा है ये रस्साकशी
इक सिरा मुझको दिया होता तो कुछ बात भी थी
मुझसे तगडा भी है और सामने आता भी नहीं
सामने आये मेरे देखा मुझे बात भी की
मुस्कुराये भी पुराने किसी रिश्ते के लिये
कल का अखबार था बस देख लिया रख भी दिया
वो मेरे साथ ही था दूर तक मग़र एक दिन
मुड के जो देखा तो वो और मेरे पास न था
जेब फ़ट जाये तो कुछ सिक्के भी खो जाते हैं
चौधवें चाँद को फ़िर आग लगी है देखो
फ़िर बहुत देर तलक आज उजाला होगा
राख हो जायेगा जब फ़िर से अमावस होगी

है लौ ज़िंदगी

है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी
कभी सामने आता मिलने उसे
बड़ा नाम् उसका है मशहूर है
है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी
भवर पास है चल पहन ले इसे
किनारे का फदा बहुत दूर है
है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी
सुना है वो ही करने वाला है सब
सुना है के इंसान मज़बूर है
है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी

सहमा सहमा

सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
इश्क में और कुछ नहीं होता
आदमी बावरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
एक पल देख लूँ
एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
जल गया सब जरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
चाँद जब आसमाँ पे आ जाए
आप का आसरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
 
ज़िंदगी क्या है जानने के लिये

ज़िंदगी क्या है जानने के लिये
ज़िंदा रहना बहुत जरुरी है
आज तक कोई भी रहा तो नहीं
सारी वादी उदास बैठी है
मौसमे गुल ने खुदकशी कर ली
किसने बारुद बोया बागों में
आओ हम सब पहन ले आइने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सारे हसीन लगेंगे यहाँ
है नहीं जो दिखाई देता है
आइने पर छपा हुआ चेहरा
तर्जुमा आइने का ठीक नहीं
हम को गलिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
ये बरस तो फकत दिनों में गया
लब तेरे मीर ने भी देखे है
पँखुड़ी एक गुलाब की सी है
बात सुनते तो गालिब रो जाते
ऐसे बिखरे है रात दिन जैसे
मोतियों वाला हार टूट गया
तुमने मुझको पिरो के रखा था

आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा

आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा
इतना मानूस न हो ख़िलवतेग़म से अपनी
तू कभी खुद को भी देखेगा तो ड़र जायेगा
तुम सरेराहेवफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बामेरफ़ाक़त से उतर जायेगा
ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शिश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा
ड़ूबते ड़ूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का फ़राज़
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा.  
तेरे खुशबु में बसे ख़त मैं जलाता कैसे

तेरे खुशबु में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा
जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह
याद थे मुझको जो पैगाम-ऐ-जुबानी की तरह
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे
सालाहा-साल मेरे नाम बराबर लिखे
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे
तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ.

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

वंदना

प्रेरित करो उस मार्ग की ओर,
जिस मार्ग पर अच्छे जाते हैं।
करते मर्यादा का पालन और
पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
भक्ति में अपनी शक्ति दो,
अटल विश्वास दो सत्कर्म पे।
कस लूं प्रत्यंचा वरदान दो,
आघात न हो कभी धर्म पे।
वह शक्ति दो हमें हे निधि,
निज स्वार्थ का न कभी हो मन।
सत्कर्म में ही डटे रहें,
पर सेवा में हो बस विलीन तन।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

दशहरे की छुट्टी-5

जमाना बदल गया 
देव शाम से ही चहलकदमी कर रहा था। कभी राजू से मेले की बात करता तो कभी छोटू से। उत्साह से वह एक ही बात को इतनी बार दुहरा देता कि राजू-छोटू भी झल्ला जाते। देव की उनसे कुट्टी हो जाती। लेकिन,  कब तक।
अपने उत्साह को वह छिपा सकता था नहीं और हमको बताने की उसे हिम्मत हो नहीं रही थी। अब ऐसे में राजू-छोटू ही तो थे जिनसे वह अपने दिल की इच्छा को बांट सकता था। मेले में अपनी खरीददारी की योजना को बता सकता था। इसलिए देखते ही देखते वह दोबारा राजू-छोटू की दोस्ती हो जाती।
इस बीच वह कभी-कभी हमसे भी पूछ बैठता कि हम ग्यारह बजे जा रहे हैं या साढ़े ग्यारह बजे। नौ बजे से ही उसने लोगों को तैयार होने के लिए कहना शुरू कर दिया। घर के लोग कई बार उसे डांट भी देते। और वह बेचारा अपना सा मुंह लिए बालकनी में चला जाता। जब उसे कोई मनाने नहीं जाता तो खुद ही थोड़ी देर में हॉल में लौटता और फिर शुरू हो जाता अपने मुद्दे पर। कब चलना है- ग्यारह बजे कि साढ़े ग्यारह बजे।
खैर, समय आ गया और लोग जाने के लिए तैयार होने लगे। करीब साढ़े ग्यारह बजे हम मां दुर्गा के दर्शन व मेला घूमने के लिए निकल पड़े। सबसे पहले भुइयांडीह पहुंचे और वहां लगे पंडालों में मां के दर्शन किए। इस बार यहां पंडाल को देवघर के मंदिरों का रूप दिया गया था। काफी आकर्षक लग रहे थे। लेकिन, देव के लिए आकर्षण के  केंद्र तो वहां लगाए गए झूले थे। पहले देव ने घोड़े की सवारी की और फिर वह बड़ी वाली चर्खी (झूले) पर चढ़ने की जिद्द करने लगा। तय हुआ कि हम,  छोटू और देव एक साथ चर्खी पर बैठेंगे। हम एक ही साथ बैठे। जब झूला धीमी रफ्तार में था तो हम दोनों को कुछ भी एहसास नहीं हुआ। लेकिन,  देव खुश था। जैसे-जैसे उसकी रफ्तार बढ़ती गई हमारी तो जान निकलने लगी लेकिन,  देव की खुशी दूनी होने लगी। यहां से निकलकर हम आगे पंडाल में गए। वहां भी झूले लगे हुए थे। हमें लगा था कि अब वह फिर से झूले पर चढ़ने को नहीं कहेगा लेकिन,  हम गलत थे। जैसे ही उसने झूले को देखा वह मचलने लगा। जिद्द करने लगा। हमारी तो बोलती बंद हो गई।
खो गए बचपन की यादों में। पहली बार जब झूले पर चढ़े थे। उत्साह तो काफी था लेकिन,  जब झूले की रफ्तार तेज हुई तो जान ही हाथ में आ गई। भगवान से मना रहा था कि जल्दी झूला रुके और जान बचे। तब यह तय किया था कभी जिंदगी में झूले पर नहीं चढ़ेंगे। लेकिन देव की जिद्द के आगे संकल्प टिक नहीं पाया। झूले पर चढ़ गए और महसूस किया बदलते हुए जमाने को। हम जब सात-आठ वर्ष की उम्र में थे शायद ही कोई साथी झूले पर बैठने की हिम्मत जुटा पाते थे लेकिन, कल देखा कि केवल देव ही नहीं बल्कि उसकी उम्र के कई बच्चे रोमांचित थे। पूछने पर देव कहता है- लाइफ में एडवेंचर नहीं तो कुछ भी नहीं।
हम कई पंडाल घूमे और लगातार घूमते रहे। जहां कहीं भी नया दिखता देव प्रश्न करता और हम लोगों को उत्तर देने ही पड़ते। रात साढ़े ग्यारह बजे से सुबह पांच बजे तक घूमने में देव बिलकुल थका नहीं। हमें याद आ रहा था जब अंतिम बार दशहरा का मेला घूमे थे। उस समय नौवीं कक्षा में पढ़ते थे। तब हमें उतना ही उत्साह रहता था जितना उस समय देव था। कई बार तो अब भी बच्चा हो जाते थे। फिर सतर्क हो जाते थे कि बच्चे साथ में हैं।
अरे हम तो पुरानी कहानी को आगे बढ़ाना ही भूल गए। तो केकई ने काल का सारथी बनकर रावण के वध के लिए राम, लक्ष्मण और सीता को जंगल भेज दिया। वहां रावण ने अपनी बहन सूर्पणखा के कहने पर सीता का हरण कर लिया। इसके बाद राम ने हनुमान, सग्रीव, बाली और रावण के भाई विभीषण के साथ मिलकर एक सेना बनाई। रावण को समझौते के लिए प्रस्ताव दिया। लेकिन, उसे मंजूर नहीं था। युद्ध हुआ। रावण के सभी सगे संबंधी मारे गए। अहंकारी रावण जिसका प्राण नाभी में था उसका भेदन करके राम ने त्रिलोक को भयमुक्त कर दिया। आश्विन मास की दसवीं तिथि ही थी जब रावण को राम ने मारा था। इसलिए इस तिथि को विजया दशमी भी कहते हैं। इसी दिन मां दुर्गा ने शिक्त के रूप में अवतार लेकर महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसिलए यह दिन दशहरा और विजया दशमी के नाम से जाना जाता है।
समाप्त

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

दशहरे की छुट्टी-4


जमाना बदल गया 
जाने कई बार अपने कंधों पर बैठाकर पापा ने गड्ढों को पार करवाया। जीवन की पगडंडी पर जब भी लखड़ाते पापा अपना कंधा आगे कर देते। डांटते-फटकारते भी लेकिन,  रात को जब सोते समय अपने ललाट पर पापा के होठों की नर्माहट महसूस करता तो सारी शिकायतें दूर हो जातीं। महसूस होता कि उनका लहू जो हमारी नसों में बह रहा है वह एक दिन ज्यादा गाढ़ा हो जाएगा और शायद यही कसमसाहट जो पीढ़ी के अंतर होने के कारण उनके और हमारे बीच है वही हमारे और हमारे बच्चे के बीच पैदा होगी। सृष्टि के प्रारंभ के साथ ही जो मानव के भीतर नवोन्मेषी प्रवृत्ति भर गई थी शायद वही इस पीढ़ी के बीच भावों और विचारों के अंतर के लिए जिम्मेदार है। पापा इन पीढ़ियों के बीच हद तक सामंजस्य बैठाते रहे लेकिन,  अब जबकि उम्र के इस पड़ाव पर हम पहुंच गए हैं डर लगता है कि अगली पीढ़ी के साथ कैसे सामंजस्य बैठा पाएंगे।
अरे हम कहां भटक गए। हां तो पापा ने गड्ढा पार करवाया,  लेकिन बात फिर से शुरू नहीं की। कुछ देर तक तो हम भी इंतजार करते रहे परंतु फिर रहा नहीं गया। टोका पापा,  आगे तो बताइए।
पापा भी मश्करे के मूड में थे। बोले, क्या आगे। आगे तो घर आने वाला है।
अरे नहीं पापा,  वो भगवानजी वाली कहानी में आगे क्या हुआ? हमने हिचकोले खाते हुए कहा।
अच्छा तो आप इसे कहानी मानते हैं। चलिए,  कोई बात नहीं। लेकिन, हर कहानी में जीवन का रहस्य और भविष्य की सीख। क्या आपको इस कहानी से जीवन का रहस्य पता कर पा रहे हैं या कोई सीख ले पा रहे हैं?
हां पापा। रावण को मारने के लिए भगवान को पैदा होना पड़ा। मतलब,  जब भी सत्य पर असत्य भारी पड़ने लगता है तब भगवान अवतार लेते हैं।
चलिए, कम से कम आपको इतना तो समझ आया। अब आगे सुनिए-
राक्षसों को खत्म करने की जिम्मेदारी तो दे दी गई लेकिन,  उन्हें यह नहीं बताया गया कि आगे की रणनीति क्या होगी।
बेचारे विष्णु भगवान ने तय किया कि उन्हें अब धरती पर अवतार लेना होगा। क्योंकि, चौरासी लाख योनियों में एक मनुष्य ही एक ऐसी योनी है जिसके पास विनाश और निर्माण दोनों की शक्ति होती है।
तीन-तीन शादियों के बावजूद पुत्र रत्न से महरूम थे। वह लगातार यज्ञ करा रहे थे। इस समय वह एक मनोकामना सिद्धी यज्ञ करवा रहे थे। विष्णुजी ने एक तीर से दो शिकार किया। उन्होंने खुद अवतार लेकर दशरथ को राज्य का वारिश दे दिया और पृथ्वी को रावण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया। यही नहीं, भगवान विष्णु की सवारी शेषनाग ने भी लक्ष्मण के रूप में दशरथ के यहां ही अवतार लिया। भरत और शत्रुघ्न नामक दो और पुत्र राजा दशरथ को हुए।
चंद्र की कलाओं की तरह चारो बालक बड़े होने लगे। तीनों रानियों व चारों राजकुमारों में इतना पटता कि रावण वध का कोई कारण बनता दिखाई नहीं देता। इसलिए काल ने राजकुमारों को पढ़ने के लिए गुरुकुल में भेजने की रणनीति बनाई। वहां भी चारों राजकुमार पढ़ते तथा मर्यादा का पालन करते हुए एक दूसरे को परस्पर आदर और स्नेह देते। चारों राजकुमारों ने मिलकर महर्षि विश्वामित्र व वशिष्ठ के कई यज्ञों की रक्षा की। किशोरावस्था पार करने व शिक्षा प्राप्त करने के बाद चारों युवराज अयोध्या लौटे। लेकिन,  इससे पहले मिथिला के राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता का स्वयंवर रखा। उन्हें शर्त रखी कि जो भी शिव धनुष को तोड़ेगा उसके साथ ही सीता का विवाह होगा। महर्षि के साथ राम, लक्ष्मण,  भरत व शत्रुघ्न भी वहां पहुंचे। वहां स्वयंवर की शर्त पूरी करते हुए श्रीराम और सीता की शादी हुई। साथ ही वहीं भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न की भी शादी हई।
अयोध्या लौटने के बाद दशरथ ने राम को भावी महाराज बनाने की घोषणा कर दी। इसे जनता ने और महारानियों ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया। लेकिन,  भगवान विष्णु के अवतार लेने का उद्देश्य सफल नहीं हो पा रहा था। इसलिए उन्होंने काल को मंथरा के रूप में दशरथ के राजमहल में प्रवेश करा दिया। मंथरा ने युवराज भरत की मां को राम के प्रति भड़काया। केकई ने कोपभवन का रुख किया। दशरथ उन्हें मनाने पहुंचे। केकई ने राम को चौदह वर्ष के लिए वनवास और भरत को राज्याभिषेक के लिए राजा दशरथ को मना लिया।
आप जानते हैं कि दशरथ जैसे प्रतापी राजा ने आखिर केकई की ऐसी शर्त मान क्यों ली?
नहीं पापा।
केकई वास्तव में एक कुशल योद्धा थीं। जब दशरथ युद्ध पर जाते तो केकई भी उनके साथ जाती थीं। एक बार युद्ध के दौरान राजा दशरथ के रथ की धूरी टूट गई और वे दुश्मनों से घिर गए। तब केकई ने उनकी जान बचाई थी। इसके बदले में ही दशरथ ने ही केकई की शर्त स्वीकार की।
लो घर भी आ गया। जरा बाल्टी और लोटा तो ले आइएगा। भैंस को धो (नहला) दें। इसके बाद चारा देना होगा।
और कहानी पापा? हमने उदास मन से पूछा।
बेटा, कहानी फिर सुना देंगे। बेचारी भैंस सुबह से ही बंधी है। चारा नहीं खिलाया तो दूध नहीं देगी। फिर दूध-रोटी का क्या होगा?
क्रमशः जारी

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

दशहरे की छुट्टी-3

जमाना बदल गया
राजू भाई, आप आठ आने में समोसा देते हैं और आपका बगल वाला एक रुपये में चार। ऐसा क्यों? आप हमारे पापा से ज्यादा पैसे लेते हैं।
अरे बाबू, देखा नहीं आपने उसके समोसे का रंग कैसा होता है? उसका समोसा उतना साफ नहीं होता जितना हमारा होता है। इसीलिए ज्यादा पैसे लेता हूं। राजू ने समोसा तलते हुए कहा।
अच्छा। तो आप सिर्फ रंग साफ होने के दूने पैसे लेते हैं। स्वाद तो एक ही रहता है।
नहीं भाई, वह तीसी (अलसी) के तेल में समोसा तलता है। उसका मसाला और आटा भी ठीक नहीं होता। उसे खाने से बीमारी हो सकती है। इसलिए वह सस्ता बेचता है। लीजिए, दीमाग खाना बंद करीए और समोसे खाइए।
बात जैसे-तैसे खत्म करके पीछा छुड़या और राहत की सांस ली। इस बीच पापा आ गए। समोसा-मिठाई खाने के बाद हमने गांव का रुख किया।
शहर क्या कस्बा कह सकते हैं। जैसे ही कस्बा खत्म होता धान से हरे-भरे खेत शुरू हो जाते। गांव को जाने वाला रास्ता कहीं चौड़ा होता तो कहीं पगडंडी के समान। कहीं-कहीं बारिश में कटान के कारण गड्ढे बन गए थे और उनमें नहर का पानी जमा हो गया था। उसमें उतरकर ही गड्ढे को पार करना होता था।
तब हम तीसरी कक्षा कक्षा में पढ़ते थे। छुट्टी में गांव आए थे। विजया दशमी के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। इतना जानते थे कि पिछले नौ दिनों से घर में रामचरित मानस का पाठ हो रहा है। बगल के गांव में ड्रामा हो रहा है और विजयादशमी के दिन कस्बे में मेला लगेगा जहां खिलौने और मिठाइयां मिलेंगीं। दशमी को पाठ खत्म करके पापा के साथ मेला गए और वहीं से तमाम खरीददारी और मिठाई-चाट के मजे लेने के बाद घर लौट रहे थे।
अचानक पूछ बैठे- पापा, ये दशहरा क्यों मनाया जाता है?
पाप बोले- अच्छा तो आप अभी दशहरा के बारे में नहीं जानते हैं? चलिए, बता देते हैं। दरअसल, दशहरा असत्य पर सत्य की जीत का त्योहार है। इसीलिए इसे हम विजय पर्व भी कहते हैं।
लेकिन, किसकी जीत और किसकी हार हुई थी? हमने पूछा।
बेटे, जैसे आप सिनेमा में विलेन और हीरो को देखते हैं न वैसे ही समाज में भी विलेन और हीरो हुआ करते हैं। दशहरा भी हीरो की जीत और विलेन की हार की कहानी है।
त्रेता युग में महर्षि विशेश्रवा नामक एक महर्षि हुआ करते थे। उनके यहां एक पुत्र पैदा हुआ। बचपन से ही वह पढ़ने में कुशाग्र था लेकिन, उसके अंदर आसुरी प्रवृत्ति भी मौजूद थी। महर्षि ने उसकी इसी प्रवृत्ति को देखते हुए उसका नाम रावण रखा। बड़ा होकर वह राक्षसों की साथ हो गया। उसने घोर तपस्या की और दोवताओं से सिद्धियां हासिल कर ली। इसके बाद वह पृथवी लोक पर मनुष्यों तथा ऋषियों को सताने लगा। यहां तक कि उसने विष्णुलोक और ब्रह्मलोक को भी अपने कब्जे में करने की बात ठान ली। उसके नाश के लिए भगवान विष्णु ने राम के रूप में अयोध्या के महाराज दशहरथ के यहां अवतार लिया।
लेकिन पापा, ये आसुरी शक्तियां और रावण का मतलब क्या होता है? हमने बीच में उन्हें टोकते हुए पूछा।
देखो बेटा, हर व्यक्ति के भीतर दोनों प्रकार की शक्तियां होती हैं। एक निर्माण की और दूसरी विनाश की। जो अपनी शक्तियों को निर्माण यानी जनकल्याण के कार्यों में लगाते हैं उन्हें देव और जो विनाश के कार्यों में अपनी शक्तियों को खर्च करते हैं उन्हें राक्षस या असुर कहा जाता है। रावण ने अपनी तपस्या के बल पर अमरत्व और अपराजय होने की शक्ति को प्राप्त कर चुका था। इसलिए वह घमंडी हो गया था। और जानते हो घमंड हमेशा जीव को विनाश की ओर ले जाता है। रावण को भी उसका घमंड उसे विनाश की ओर ले गया।
मतलब? आखिर कैसे? हमने पापा से पूछा।
अपराजय और अमर होने की शक्ति पाने के बाद रावण ने त्रिलोक विजयी होने की ठान ली। इसके बाद वह निरीह लोगों पर चाबुक चलाने लगा। उनका नाश करने लगा। उन्हें मारने लगा और यहां तक कि ऋषियों की तपस्या को भी अपने दूतों से भंग करवाने लगा।
धरती पर त्राहिमाम मच गया। ऋषियों ने देवताओं का आह्वान किया। रावण के विष्णुलोक और ब्रह्मलोक पर कब्जा करने के संकल्प से देवता भी चिंतत थे। ऋषियों की पुकार और आसन्न संकट को देखते हुए देतवाओं ने सभा की। इसमें रावण के खात्मे की जिम्मेदारी भगवान विष्णु को सौंपी गई। तय हुआ कि वही नया अवतार लेगें और रावण से तीनों लोक के लोगों को मुक्ति दिलाएंगे।
फिर क्या हुआ? पापा के रुकने पर हमने पूछा।
अभी इस गड्ढे को पार कर लेते हैं फिर बताते हैं? पानी ज्यादा है। अभी आपको हमारे कंधे पर आना होगा। आइए बैठिए।
क्रमशः जारी

सौदा

पार्टी में खूबसूरत सी
रिसैप्शनिस्ट को देखकर
लोग कहते
कि
उसके मुखड़े पर
गजब की चमक है।
बावजूद इसके कि
उसके चेहरे पर
विषाद की रेखाएं भी
(कवि मन)
मौजूद थीं।
सुबह ही वह
अपने बच्चों की मृत्यु पर
रोयी थी,
और अभी तलक
उसके चेहरे पर
आंसू के दाग
साफ दिख रहे थे।
फिर भी
मुस्कुराहट रही थी
 क्योंकि, 
मालिक ने उससे सिर्फ
मुस्कुराने का
सौदा किया था।